नई दिल्ली | मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर बढ़ते तनाव के कारण भारत की एलपीजी (LPG) आपूर्ति पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% एलपीजी आयात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। वर्तमान में सप्लाई चेन इतनी बुरी तरह प्रभावित हुई है कि इसे पूरी तरह सामान्य होने में 3 से 4 साल का समय लग सकता है। खाड़ी देशों से होने वाला आयात अब गिरकर 55% पर आ गया है, जिससे देश की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सरकार और आम जनता के बीच हड़कंप मचा हुआ है।
भारत के लिए सबसे चिंताजनक बात यह है कि वर्तमान में देश की एलपीजी भंडारण क्षमता केवल 15 दिनों की खपत के बराबर है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल और गैस उत्पादन इकाइयों को हुए नुकसान के कारण आपूर्ति में 40% से 50% तक की कमी आई है। यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि क्षतिग्रस्त इकाइयां कब तक पुनः शुरू हो पाएंगी। इस अनिश्चितता ने सरकार को कोविड-19 जैसी आपातकालीन रणनीतियां अपनाने पर मजबूर कर दिया है, जिसमें वैकल्पिक देशों से आयात और शिपमेंट के रास्तों में बदलाव जैसे कदम शामिल हैं।
इस संकट का सीधा प्रहार आम आदमी की जेब पर पड़ा है। घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में ₹60 और कमर्शियल सिलेंडर में ₹115 तक की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस महंगाई का असर न केवल रसोई के बजट पर पड़ा है, बल्कि होटल और रेस्टोरेंट जैसे छोटे कारोबारों की लागत भी बढ़ गई है। यदि संकट लंबा खिंचता है, तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा और आने वाले दिनों में ईंधन की किल्लत और अधिक गहरा सकती है। सरकार अब घरेलू उत्पादन बढ़ाने और ऊर्जा रणनीति को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

