सबरीमला मामले की सुनवाई में जस्टिस नागरत्ना की तीखी टिप्पणी, कहा—’महिला होने के नाते कह सकती हूं कि हर महीने तीन दिन छुआछूत और चौथे दिन खत्म हो जाए, ऐसा नहीं हो सकता’

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने सबरीमला मंदिर सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू की। इस दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने अनुच्छेद 17 (छुआछूत का अंत) के संदर्भ में बेहद कड़वी सच्चाई बयां करते हुए मौखिक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि एक महिला के तौर पर वे महसूस करती हैं कि छुआछूत ऐसी प्रक्रिया नहीं हो सकती जो महीने के तीन दिन (मासिक धर्म के दौरान) लागू हो और चौथे दिन अचानक समाप्त हो जाए। जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि छुआछूत का एक लंबा इतिहास रहा है और इसे खत्म करने के लिए ही अनुच्छेद 17 को मौलिक अधिकार बनाया गया था।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील देते हुए कहा कि सबरीमला का मामला केवल एक विशिष्ट मंदिर और उसकी मान्यताओं से जुड़ा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भगवान अय्यप्पा के अन्य सभी मंदिर महिलाओं के लिए खुले हैं, केवल इस एक मंदिर में परंपरा के कारण प्रतिबंध है। मेहता ने अदालतों द्वारा ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ को सीमित दायरे में परिभाषित करने पर आपत्ति जताई। उन्होंने उदाहरण दिया कि जैसे मजार या गुरुद्वारे में सिर ढकना उस धर्म के सिद्धांतों का सम्मान है, वैसे ही सबरीमला की परंपरा को किसी की आजादी छीनने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि भारतीय समाज महिलाओं को देवियों के समान पूजता है, इसलिए इसे लैंगिक रूढ़िवादिता नहीं मानना चाहिए।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि यदि कोई सामाजिक बुराई धार्मिक प्रथा के नाम पर समाज में व्याप्त है, तो अदालत को यह अधिकार है कि वह उन दोनों के बीच अंतर स्पष्ट करे। उन्होंने कहा कि यह देखा जाना जरूरी है कि क्या वह वाकई धर्म का अनिवार्य हिस्सा है या सिर्फ एक सामाजिक बुराई। बता दें कि इससे पहले सितंबर 2018 में पांच जजों की पीठ ने महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था, लेकिन बाद में इस कानूनी जटिलता को बड़ी पीठ के पास भेज दिया गया था। अब नौ जजों की यह पीठ इस मामले में धर्म की स्वतंत्रता और संवैधानिक समानता के बीच के संतुलन पर अंतिम निर्णय लेगी।

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