आपराधिक प्रकरण में आरोपी बनाने गये सब-रजिस्ट्रार को राहत

जबलपुर। आपराधिक प्रकरण में आरोपी बनाने गये सब-रजिस्ट्रार को हाईकोर्ट से राहत मिली है। जस्टिस बीपी शर्मा की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सब-रजिस्ट्रार को अतिरिक्त अभियुक्त बनाये जाने के आदेश को निरस्त कर दिया है। एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि याचिकाकर्ता सब-रजिस्ट्रार होने के नाते दस्तावेज को पंजीकृत करने से मना भी नहीं कर सकता था। पंजीकरण के लिए आवश्यक सभी दस्तावेज आरोपियों द्वारा प्रस्तुत किये गये थे।

याचिकाकर्ता आनंद कुमार पांडे की ओर से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि आरोपी संजीव श्रीवास्तव तथा यूसुफ अली राजा ने 20 मार्च 2018 को एक लीज डीड के जरिए एक ऐसे प्लॉट को बेच दिया, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं था। लीज डीड का पंजीयन इटारसी स्थित सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय में सब-रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत याचिकाकर्ता के द्वारा अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए किया गया था। ट्रायल कोई के द्वारा धारा 319 का प्रयोग करते हुए 10 जनवरी 2025 को पारित अपने आदेश में याचिकाकर्ता को प्रकरण में अतिरिक्त आरोपी बनाते हुए समन जारी कर दिये। ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि विचाराधीन पट्टा विलेख में कथित तौर पर कुछ त्रुटियां थीं। सब-रजिस्ट्रार को उक्त दस्तावेज का पंजीकरण करने से पूर्व, उसमें सुधार हेतु उसे वापस लौटा देना चाहिए था। याचिका में कहा गया था कि पट्टा विलेख का पंजीकरण याचिकाकर्ता द्वारा अपने शासकीय कार्यों के सामान्य क्रम में ही किया गया था। सब-रजिस्ट्रार होने के नाते वह दस्तावेज को पंजीकृत करने से मना भी नहीं कर सकता था। दस्तावेज के निष्पादन का आदेश नगर परिषद के सीएमओं के द्वारा जारी आदेश के साथ आरआई ने उनके समक्ष प्रस्तुत किया था। जो पहले भी उसी योजना के तहत अन्य भूखंड धारकों के पट्टा विलेखों के निष्पादन और पंजीकरण के लिए उपस्थित होते रहे थे। दस्तावेज कानून के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है, तो सब-रजिस्ट्रार उसे पंजीकृत करने के लिए बाध्य होता है। पंजीकरण अस्वीकार करने का कोई अवसर ही नहीं था। याचिका में कहा गया था कि नर्मदापुरम जिले के वरिष्ठ जिला रजिस्ट्रार द्वारा कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को पत्र के माध्यम से इस बात की पुष्टि गयी है कि उक्त दस्तावेज का पंजीकरण नियमों और विनियमों का पालन करते हुए ही किया गया था। याचिकाकर्ता की तरफ से किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं की गयी है। पंजीकरण के पूर्व प्रीमियम राशि का भुगतान भी कर दिया गया था। सुनवाई पश्चात् न्यायालय ने उक्त निर्देश दिये।

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