इंदौर: मध्यप्रदेश के समग्र विकास की दिशा में नीतिगत चिंतन को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से इंदौर डेवलपमेंट फाउंडेशन द्वारा मध्यप्रदेश के विकास की चुनौतियां एवं समाधान विषय पर बुधवार को एक महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित किया गया. यह सम्मेलन देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग, खंडवा रोड स्थित परिसर में संपन्न हुआ.सम्मेलन में विषय विशेषज्ञों, उद्योग एवं व्यापार क्षेत्र के प्रतिनिधियों, समाजसेवियों और प्रदेश के प्रबुद्ध नागरिकों ने सक्रिय भागीदारी की. विभिन्न सत्रों में प्रदेश के आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों पर गहन चर्चा हुई, जिसमें विकास की गति को प्रभावित करने वाली चुनौतियों और उनके व्यावहारिक समाधान पर विचार-विमर्श किया गया.
यह सम्मेलन प्रदेश के समावेशी और संतुलित विकास के लिए सामूहिक चिंतन और ठोस पहल का महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमिताभ कुंडू ने 16वें वित्त आयोग की अनुशंसाओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता बताते हुए कहा कि यदि आबादी के सही आंकड़ों के आधार पर संसाधनों का वितरण होता, तो मध्य प्रदेश को उसका उचित हिस्सा मिल सकता था. उन्होंने बताया कि राज्य की एसडीपी वृद्धि दर 11.8′ है, जो राष्ट्रीय औसत 8′ से अधिक है, लेकिन संरचनात्मक विकास की कमी अब भी स्पष्ट है. राज्य में उद्योगों से रोजगार केवल 4′ है और एफडीआई 1′ से भी कम है. मनोहर देव एवं प्रो. रेखा आचार्य ने समापन उद्बोधन दिया.
नीतिगत असंतुलन दूर करें
पूर्व राज्यपाल वी.एस. कोकजे ने अर्थव्यवस्था में व्याप्त विरोधाभासों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि एक ओर सरकार राजस्व बढ़ाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर शराबबंदी जैसे कदमों की चर्चा होती है. उन्होंने शहरों की ओर पलायन रोकने और नीतिगत असंतुलन दूर करने पर जोर दिया.
शिक्षा की गुणवत्ता सुधार पर ध्यान देने की आवश्यकता
पूर्व मंत्री नरेंद्र नाहटा ने शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की कमजोरियों को रेखांकित करते हुए कहा कि देवी अहिल्या विश्वविद्यालय देश के शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में शामिल नहीं है, जो चिंता का विषय है. उन्होंने बताया कि प्रदेश में हर साल लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लिया जा रहा है और 30-40 हजार करोड़ रुपये ब्याज में खर्च हो रहे हैं. शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई.
कृषि उत्पादों का वैल्यू एडिशन नहीं हो रहा
अर्थशास्त्री गणेश कावड़िया ने कृषि क्षेत्र की उपलब्धियों को सराहा और कहा कि जहां उत्पादन तीन गुना बढ़ा है और राज्य ने कई बार कृषि कर्मण पुरस्कार जीता है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कृषि उत्पादों का वैल्यू एडिशन राज्य में नहीं हो रहा, जिससे आर्थिक लाभ अन्य राज्यों को मिल रहा है.
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय शासन को सशक्त बनाएं
कार्यक्रम में डॉ. डी.के. वर्मा ने शोध और सामाजिक विज्ञान की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए युवाओं को प्रश्न उठाने के लिए प्रेरित किया. वहीं, यतीन्द्र सिंह सिसौदिया ने गरीबी, बेरोजगारी और असमानता पर काम करने तथा ग्राम पंचायतों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया. डॉ. सिसोदिया ने तृणमूल सुशासन और ग्रामीण विकास पर जोर देते हुए एकीकृत पंचायत राज व्यवस्था और पंचायतों में महिलाओं के बढ़ते प्रतिनिधित्व की चर्चा की. उन्होंने पेसा कानून 1997 के महत्व को रेखांकित किया और इसके नियमों के निर्धारण में हुई देरी को चिंता का विषय बताया. उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक बदलाव के लिए स्थानीय शासन को और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता है
