भोर का गीत: जब मासूम सवालों ने झकझोर दी पर्यावरण के प्रति संवेदनाएं

भोपाल: जब मंच पर एक बच्चा आसमान से पूछता है कि पेड़ क्यों रोते हैं और हवा इतनी थकी हुई क्यों लगती है, तो सभागार में एक गहरी खामोशी उतर आती है। यही खामोशी आगे चलकर सोच में बदलती है और इसी क्षण से नाटक पर्यावरण को लेकर लोगों की संवेदनाओं को उकेरना शूरू करता है. दुष्यंत कुमार पाण्डुलिपि संग्रहालय में चल रहे समर नाट्य उत्सव के तीसरे दिन मंगलवार को इस नाटक भोर का गीत का मंचन किया गया। स्वर्गीय समरसेन गुप्ता की स्मृति में आयोजित इस उत्सव का संयोजन काबीला सोसायटी फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स द्वारा किया गया. नाटक की सबसे खास बात यह रही कि एक अकेला कलाकार पूरे मंच को जीवंत करता है.

लेखक निर्देशक और संगीतकार दीपक नेमा की परिकल्पना को मंच पर उज्ज्वल सिन्हा ने जिस सहजता और ऊर्जा के साथ उतारा, उसने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। एनसेंबल थियेटर इन एजुकेशन सोसायटी की प्रस्तुति में यह नाटक बच्चों की दुनिया से शुरू होकर पर्यावरण जैसे गंभीर विषय तक पहुंचता है। यह नाटक यह साबित करता है कि रंगमंच केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज और पर्यावरण के सवालों को उठाने का प्रभावी माध्यम भी है।
नाटक की कहानी एक बच्चे की कल्पनाओं के जरिए प्रकृति से उसके रिश्ते को टटोलती है। जिसमें पेड़, हवा, नदी और आसमान से जुड़े सवाल धीरे धीरे एक बड़े सच की ओर इशारा करते हैं। नाटक के दौरान संवाद और गीत मिलकर एक ऐसी लय रचते हैं, जो मनोरंजन के साथ साथ भीतर कहीं बेचैनी भी छोड़ जाती है और दर्शकों को कल्पनाओं की दुनिया में ले जाती है। उज्ज्वल सिन्हा ने एकल अभिनय में भावों को जिस तरह से जिया, वह प्रस्तुति की सबसे मजबूत कड़ी बनकर उभरा।

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