इन्दौर: देशभर में गैस सिलेंडरों की कमी ने लोगों को एक बार फिर पारंपरिक साधनों की ओर लौटने पर मजबूर कर दिया है. जिन चूल्हों और सिगड़ियों को कभी प्रदूषण और स्वास्थ्य कारणों से लगभग बंद कर दिया गया था, वही अब जरूरत के समय सबसे बड़ा सहारा बनते नजर आ रहे हैं.गैस की किल्लत के चलते जहां शहरी क्षेत्रों में कुछ लोगों ने इंडक्शन चूल्हों का सहारा लिया, वहीं उनकी बढ़ती कीमतों और बिजली की सीमाओं ने आम लोगों को फिर से पारंपरिक विकल्प अपनाने पर मजबूर कर दिया. ग्रामीण इलाकों में तो पहले से ही बिजली की समस्या रहती है, ऐसे में सिगड़ी और चूल्हे ही सबसे भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आए हैं. सिगड़ी में लकड़ी और कोयले के साथ गो शाला में उपलब्ध कंडे का उपयोग किया जाता है.
बाजार में बढ़ी मांग, कारीगरों के पास ऑर्डर की भरमार
इंदौर और आसपास के क्षेत्रों में सिगड़ी बनाने वाले कारीगरों के पास इन दिनों भारी मांग है. 35 वर्षों से सिगड़ी बना रहे कारीगर अब्दुल गफ्फार नागौरी बताते हैं कि ऐसी स्थिति पहले बहुत कम देखने को मिली है- अब सिगड़ियां बनते ही तुरंत बिक जा रही हैं. घर से लेकर होटलों तक, हर जगह इनकी मांग तेजी से बढ़ी है.
भोजनालय भी अपना रहे पारंपरिक तरीका
पीपली बाजार स्थित जैन भोजनशाला के पदाधिकारी महावीर जैन के अनुसार, गैस सिलेंडर न मिलने से रोजाना 20-30 लोगों के भोजन की व्यवस्था करना मुश्किल हो रहा था. इसी कारण उन्होंने दो सिगड़ियां खरीदीं, ताकि खाना बनाना जारी रखा जा सके. इस सिगड़ी में कोयले लकड़ी के साथ गो शाला से लाये कंडे का भी उपयोग हम करेंगे.
बिजली और गैस दोनों की समस्या, सिगड़ी बनी विकल्प
पुनासा निवासी नवनीत जायसवाल बताते हैं कि हमारे ग्रामीण क्षेत्र में में बिजली की समस्या भी होती है. समय पर बिजली नहीं होती है तो इंडक्शन चूल्हे काम नहीं कर पाते. ऐसे में ग्रामीण बड़ी संख्या में सिगड़ियां खरीद रहे हैं, क्योंकि यह नहीं पता कि गैस की समस्या कब तक बनी रहेगी.
आधुनिक रूप में लौटी सिगड़ी
व्यापारी श्याम खत्री ने पारंपरिक सिगड़ी को आधुनिक रूप देकर बाजार में उतारा है. इन सिगड़ियों में ब्लोअर लगाया गया है, जिससे धुआं कम होता है और खाना बनाना आसान हो जाता है. अब यह सिगड़ियां सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि शौक और सुविधा के रूप में भी खरीदी जा रही हैं. इसमें परंपरागत तरीके से खाना बनाया जा सकता है इसमें कोयला लकड़ी और कंडे का उपयोग किया जा सकता है.
परंपरा और आधुनिकता का संगम
गैस संकट ने यह साबित कर दिया है कि पारंपरिक साधन आज भी प्रासंगिक हैं.
अब सिगड़ी और चूल्हे केवल अतीत की चीज नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक के साथ एक नया विकल्प बनकर उभर रहे हैं.
