फैसला सर्वसम्मति से हो

संसद का नया सत्र प्रारंभ होते ही स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का चुनाव होगा.स्पीकर का चुनाव आवश्यक होता है जबकि डिप्टी स्पीकर का पद रहे या ना रहे यह बहुमत प्राप्त दल पर निर्भर है. पिछली बार डिप्टी स्पीकर का पद नहीं था. इसकी बजाय सभापति का एक पैनल था जो स्पीकर के स्थान पर सत्र का संचालन करता था. संभावना है कि नई राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इस बार स्पीकर और डिप्टी स्पीकर दोनों के पद रहेंगे.एनडीए के दलों ने फैसला किया है कि स्पीकर का पद भाजपा के पास रहेगा. परंपरा है कि डिप्टी स्पीकर का पद विपक्षी दलों के पास रहता है लेकिन ऐसा लगता नहीं कि डिप्टी स्पीकर के लिए भाजपा विपक्षी दलों का दावा स्वीकार करेगी. इसकी बजाय संभावना यही है कि डिप्टी स्पीकर का पद एनडीए के घटक दलों के पास रहे. यानी जनता दल यूनाइटेड या तेलुगू देशम पार्टी को डिप्टी स्पीकर का पद मिल सकता है. हालांकि स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा के लिए यदि एनडीए स्पीकर का पद इंडिया गठबंधन को दे दे तो स्पीकर और डिप्टी स्पीकर दोनों का चुनाव निर्विरोध हो सकता है. यह एक ऐसा सकारात्मक कदम होगा जिससे सदन को सुचारू रूप से चलने में या चलाने में परेशानी नहीं आएगी. कुल मिलाकर इस संबंध में भाजपा के नेतृत्व को फैसला लेना चाहिए. दरअसल ,24 जून को संसद का सत्र प्रारंभ होगा. सबसे पहले प्रोटेम स्पीकर नई लोकसभा सदस्यों को शपथ दिलाएंगे इसके बाद 26 जून को स्पीकर का चुनाव निर्धारित किया गया है. गठबंधन के दौर में स्पीकर का पद महत्वपूर्ण हो जाता है. जाहिर है भाजपा स्पीकर का पद अपने पास रखना चाहेगी. इसके पहले की एनडीए सरकारों में डिप्टी स्पीकर का पद विपक्ष को दिया गया है लेकिन कई वर्षों तक डिप्टी स्पीकर का पद गठबंधन की पार्टियों को दिया गया है. इस बार भी ऐसा ही होने की संभावना है. भाजपा को इस संबंध में उदारता से विचार करना चाहिए क्योंकि

2024 के लोकसभा चुनावों के परिणाम और रुझानों से स्पष्ट है कि जनता मजबूत और नए भारत के साथ ही बुनियादी समस्याओं का हल भी चाहती है. बुनियादी या जनता से जुड़ी समस्याओं का मतलब यह है कि संसद में महंगाई, बेरोजगारी, महिला उत्पीडऩ, किसानों, दलित और आदिवासियों की समस्याओं पर चर्चा हो. सभी जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठाएं और उनका हल करने के लिए संसद के जरिए प्रयत्न करें. देश की जनता यही चाहती है कि पक्ष और विपक्ष मिलजुल कर देश की उन्नति में एक दूसरे को सहयोग दें. जाहिर है इस मामले में सत्ता पक्ष की जवाबदारी सबसे अधिक बनती है. सदन को चलाना और स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं को कायम रखने की सबसे ज्यादा जवाबदारी केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की है. जनता ने देखा है कि पिछली बार संसद की कार्रवाई लगभग हर सत्र में बाधित हुई है. संसद में हंगामे के कारण जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा व्यर्थ चला जाता है. हंगामे के कारण सदन की कार्रवाई बाधित होती है और सार्थक बहस नहीं हो पाती. पिछली बार देखा गया है कि कई महत्वपूर्ण विधेयक भाजपा ने बहुमत के दम पर ध्वनि मत से पारित करवा लिए. यानी शोर शराबे के बीच बिना किसी बहस के विधेयकों को पारित घोषित कर दिया गया. ऐसा नहीं है कि संसद बाधित होने के पीछे केवल सत्ताधारी लाल की गलती होती है.कई बार विपक्षी दल भी अपनी जिद के कारण सदन चलने नहीं देते. कुल मिलाकर कारण कुछ भी हो संसद का नहीं चलना देश का नुकसान है. इसलिए जरूरी है कि पक्ष और विपक्ष मिलजुलकर संसद की कार्रवाई चलाएं. यह तभी हो सकता है जब सत्ताधारी दल उदारता पूर्वक विपक्ष की उचित मांगों को मंजूर करें. इसकी शुरुआत विपक्ष को डिप्टी स्पीकर का पद देकर की जा सकती है.

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