मुंबई/नागपुर | चल रहे वैश्विक युद्ध और इंडोनेशिया की बदली व्यापारिक नीतियों ने भारतीय उद्योग जगत के लिए कोयले का संकट पैदा कर दिया है। विदेशी कोयला, जो पहले ₹8,000 से ₹9,200 प्रति टन मिलता था, अब ₹11,500 के पार पहुँच गया है। इंडोनेशिया द्वारा उत्पादन घटाने और लेनदेन के कड़े नियमों के कारण आपूर्ति बाधित हुई है। इसके साथ ही, समुद्री माल ढुलाई (Liner cost) बढ़ने से आयातित कोयले की रफ़्तार सुस्त पड़ गई है। स्थानीय बाजार में कोयले की किल्लत का फायदा उठाकर अब कोयला ₹1,500 प्रति टन तक के भारी प्रीमियम पर बिक रहा है, जिससे बिजली संयंत्रों और इस्पात उद्योगों की कमर टूट गई है।
कोयले की कमी के बीच अब गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे हैं। विदर्भ इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (VIA) और कई उद्यमियों ने आरोप लगाया है कि वेकोलि (WCL) की खदानों से मिलने वाले कोयले में बड़े पैमाने पर पत्थर मिलाए जा रहे हैं, जिससे फैक्ट्रियों की महंगी मशीनें खराब हो रही हैं। वहीं, छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) की स्थिति और भी बदतर है। महाराष्ट्र स्टेट माइनिंग कॉरपोरेशन से मिलने वाले कोटे की फाइलें मंत्रालय में अटकी हुई हैं, जिसके कारण छोटे उद्यमियों को खुले बाजार से महंगी दरों पर कोयला खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। गर्मी का सीजन शुरू होने से पावर हाउस की मांग बढ़ने के कारण यह संकट और गहराने के आसार हैं।
कोयले की कीमतों में लगी आग का असर अब अंतिम उत्पादों पर दिखने लगा है। विशेषज्ञों के अनुसार, कच्चे माल, केमिकल और प्लास्टिक की बढ़ती कीमतों के कारण कुल उत्पादन लागत में कम से कम 20% की बढ़ोतरी हुई है। वीआईए के अध्यक्ष प्रशांत मोहोता के अनुसार, विदेशी कोयला 25% और देसी कोयला 15% तक महंगा हो चुका है। यदि सरकार ने जल्द ही हस्तक्षेप कर कोटा जारी नहीं किया और मिलावट पर लगाम नहीं लगाई, तो कई औद्योगिक इकाइयों का संचालन बंद होने की कगार पर पहुँच जाएगा। उद्योग जगत अब केंद्र और राज्य सरकार से इस आपातकालीन स्थिति में तत्काल राहत पैकेज और सुचारू आपूर्ति की मांग कर रहा है।

