पाकिस्तान सेना अब “बिना तख्तापलट के तख्तापलट” के तरीके से काबिज है सत्ता पर : अजय बिसारिया

नयी दिल्ली 11 मार्च (वार्ता) पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त रहे अजय बिसारिया ने बुधवार को कहा कि पाकिस्तान की सेना ने सैन्य तख्तापलटों से आगे बढ़कर अब “बिना तख्तापलट के तख्तापलट” करने के तरीकों को अपनाया है जिसमें सेना राजनीतिक सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखती है लेकिन ऊपर से नागरिक सरकार का ढांचा दिखाया जाता है। भारत के पड़ोस में बदलती परिस्थितियों पर संयुक्त युद्ध अध्ययन केंद्र द्वारा यहां आयोजित संगोष्ठी में “बिना तख्तापलट के तख्तापलट – पाकिस्तान की राजनीति में सेना की भूमिका का उसकी विदेश नीति और भारत के साथ भविष्य के संबंधों पर प्रभाव” विषय पर बोलते हुए श्री बिसारिया ने कहा कि हाल के वर्षों में औपचारिक सैन्य तख्तापलट नहीं होने के बावजूद पाकिस्तान की राजनीति में सैन्य प्रभुत्व लगातार बना हुआ है।

पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश में कई बार सेना ने सत्ता पर कब्जा किया है, जिनमें 1970 के दशक में जनरल जिया-उल-हक द्वारा प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को हटाया जाना भी शामिल है।

उन्होंने 1999 के सैन्य तख्तापलट का भी उल्लेख किया जिसका नेतृत्व जनरल परवेज मुशर्रफ ने किया था।

उन्होंने कहा, “वे कारगिल के प्रमुख साजिशकर्ता थे, लेकिन बाद में कश्मीर पर एक बड़े समझौते की संभावना तलाशने की कोशिशों में भी शामिल रहे।”

श्री बिसारिया ने कहा कि 11 सितम्बर के हमलों के बाद अदालत ने जनरल मुशर्रफ को माफी दे दी थी और कई मायनों में भारत के दृष्टिकोण से बाद के मुशर्रफ को पहले वाले मुशर्रफ से बेहतर माना गया।

उनके अनुसार 21वीं सदी में पाकिस्तान की सैन्य रणनीति बदल गई है। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान में तख्तापलट अब अधिक चालाक हो गए हैं। कानून के शासन का सार राजनीतिक रूप से चालाकी करना है, और यदि आप अधिक महत्वाकांक्षी हैं तो देश पर कब्जा कर लेना।” हालांकि, हाल के समय में पाकिस्तान एक ऐसे मिश्रित शासन की ओर बढ़ गया है जिसमें सेना का प्रभुत्व रहता है।

श्री बिसारिया ने कहा, “मेरे विचार से वर्तमान शासन वास्तव में एक सैन्य शासन है, जिसके ऊपर केवल नागरिक सरकार का आवरण है।”

उन्होंने कहा कि सेना बिना औपचारिक तख्तापलट किए ही सत्ता पर नियंत्रण कर रही है। “यह अधिक चालाक तख्तापलटों की ओर बढ़ गया है, ऐसे तख्तापलट जिनमें सेना सीधे सत्ता हथियाने की परेशानी उठाए बिना ही नियंत्रण हासिल कर लेती है।”

श्री बिसारिया ने कहा कि पाकिस्तान के सेना प्रमुखों का शासन की नीतियों को निर्धारित करने में प्रभाव लगातार बढ़ा है।

पूर्व सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि “बाजवा सिद्धांत” में भू-राजनीति की तुलना में भू-अर्थशास्त्र पर अधिक जोर दिया गया था। हालांकि उन्होंने कहा कि वर्तमान सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के समय में यह दृष्टिकोण बदल गया है।

उन्होंने कहा, “यदि आप मुनीर सिद्धांत को देखें, तो उन्होंने पाकिस्तान की मूल वैचारिक धारणाओं से प्रेरणा ली है और वे लगभग जिन्ना और जिया-उल-हक के मिश्रण के रूप में उभरे हैं।”

उनके अनुसार जनरल मुनीर की वैचारिक सोच ने पाकिस्तान की पहचान के रक्षक के रूप में सेना की भूमिका को और मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि मुनीर ने दो-राष्ट्र सिद्धांत और कश्मीर को पाकिस्तान की जीवन रेखा बताते हुए सेना को देश की वैचारिक सीमाओं का रक्षक बताया है।

उन्होंने कहा, “कई सेना पर्यवेक्षकों ने उन्हें वर्दी में इस्लामवादी कहा है, जबकि कुछ अन्य का मानना है कि सेना अब एक नियमित सेना से अधिक एक विद्रोही संगठन की तरह व्यवहार कर रही है।”

श्री बिसारिया ने कहा कि पाकिस्तान इस समय एक “बहु-संकट” की स्थिति का सामना कर रहा है, जिसमें राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े संकट एक साथ मौजूद हैं और यह स्थिति लगभग 2021 के आसपास शुरू हुई थी।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता अक्सर उसकी विदेश नीति के व्यवहार में भी दिखाई देती है। उन्होंने कहा, “जब शासन कमजोर होता है, तो भारत के साथ नियंत्रित संघर्ष पैदा करना एक ऐसा तरीका होता है जिससे शासन अपनी स्थिति को मजबूत कर सकता है।”

उन्होंने चेतावनी दी कि पाकिस्तान की विदेश नीति पर सेना का अत्यधिक प्रभाव है। उन्होंने कहा, “यह निश्चित रूप से सेना द्वारा नियंत्रित विदेश नीति है और इसका प्रमुख साझेदार चीन है।”

श्री बिसारिया ने कहा कि भविष्य में यदि कोई संघर्ष होता है तो उसमें फिर से “सांठगांठ वाला युद्धक्षेत्र” देखने को मिल सकता है।

 

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