बंगाल में अंतिम मतदाता सूची से नाम हटाने के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई करेगा उच्चतम न्यायालय

नयी दिल्ली, 09 मार्च (वार्ता) उच्चतम न्यायालय मंगलवार को दो याचिकाओं पर सुनवाई करेगा, जिनमें 28 फरवरी को प्रकाशित हुई पश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची से नाम हटाने को चुनौती दी गयी है।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि उनके नाम विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से पहले मतदाता सूची में थे और उन्होंने मतदाता के तौर पर नाम शामिल करने तथा बने रहने के समर्थन में सभी ज़रूरी दस्तावेज़ जमा कर दिए थे।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ पश्चिम बंगाल एसआईआर के मुख्य मामले के साथ इस याचिका पर सुनवाई करेगी। उच्चतम न्यायालय ने वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी के अनुरोध के बाद इन याचिकाओं पर सुनवाई का फैसला किया।

सुनवाई से पहले मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता से पूछा कि क्या वैधानिक उपायों को दरकिनार करते हुए सीधे उच्चतम न्यायालय में याचिकाएं दायर की जा सकती हैं।

इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि संबंधित आदेश प्रभावित याचिकाकर्ताओं को अब तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं, इसलिए वे वैधानिक उपायों का सहारा नहीं ले पा रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय ने 24 फरवरी के अपने आदेश में निर्वाचन आयोग को 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की अनुमति दी थी। साथ ही यह भी कहा था कि “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” और “अनमैप्ड” श्रेणियों में आने वाले मतदाताओं से संबंधित दावों और आपत्तियों के निपटारे के बाद प्रकाशित होने वाली पूरक मतदाता सूची को भी 28 फरवरी 2026 को प्रकाशित अंतिम सूची का हिस्सा माना जाएगा।

यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उच्चतम न्यायालय की व्यापक शक्तियों का उपयोग करते हुए पारित किया गया था। यह निर्णय कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा 22 फरवरी को भेजे गए एक पत्र के आधार पर लिया गया था। पत्र में कहा गया था कि लगभग 50 लाख नामों से जुड़े दावों और आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया में करीब 80 दिन लग सकते हैं।

इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने 20 फरवरी के अपने पहले के आदेश में ढील देते हुए अतिरिक्त न्यायिक अधिकारियों की तैनाती की अनुमति दी। अदालत ने कम से कम तीन वर्ष के अनुभव वाले सिविल न्यायाधीश (सीनियर डिवीजन) और सिविल न्यायाधीश (जूनियर डिवीजन) को इस प्रक्रिया में सहयोग के लिए नियुक्त करने की अनुमति दी।

उच्चतम न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि यदि आवश्यकता पड़े तो कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ओडिशा और झारखंड उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध कर सकते हैं कि वे समान स्तर के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को इस प्रक्रिया में सहायता के लिए उपलब्ध कराएं।

इससे पहले 20 फरवरी को उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच “विश्वास की कमी” और सहयोग के अभाव का उल्लेख करते हुए इस स्थिति को “असाधारण” बताया था और मतदाता सूची में “तार्किक विसंगतियां” श्रेणी से जुड़े दावों और आपत्तियों के निपटारे की निगरानी के लिए सेवारत और सेवानिवृत्त जिला एवं अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों की तैनाती का निर्देश दिया था।

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