इन्दौर: शहर में होली उत्सव को लेकर उत्साह चरम पर है. विभिन्न मोहल्लों, कॉलोनियों और प्रमुख चौराहों पर होलिका दहन की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. कहीं गोबर के कंडों से होलिका सजाई गई है तो कहीं परंपरागत रूप से लकड़ी और उपलों से विशाल होलिका का निर्माण किया गया है. बच्चों और युवाओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है.
बाजारों में पूजन सामग्री, रंग-गुलाल, पिचकारी, लकड़ी और कंडों की खरीदारी तेज रही. सामाजिक संगठनों और नागरिक समितियों ने लोगों से शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में पर्व मनाने की अपील की है.
राजवाड़ा की होलीः परंपरा का प्रतीक
शहर की ऐतिहासिक और परंपरागत होली पूजन का केंद्र राजवाड़ा रहेगा. यहां वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार विधि-विधान से होलिका पूजन किया जाता है. बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस आयोजन में शामिल होते हैं. राजवाड़ा की होली को शहर की सांस्कृतिक पहचान माना जाता है और यहां से उत्सव की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है.
प्रदोषकाल में होगा होलिका दहन
खजराना गणेश मंदिर के पुजारी सतपाल महराज ने बताया धर्मशास्त्रीय मान्यता के अनुसार होलिका दहन रात्रिकालीन कर्म है और इसे प्रदोषव्यापिनी तिथि में करना शास्त्रसम्मत माना गया है. 2 मार्च को शाम 6.28 से 8.52 बजे तक प्रदोषकाल में होलिका दहन किया जाएगा.
चंद्रग्रहण के कारण बदला रंगोत्सव का दिन
3 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण रहेगा. पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण के दिन शुभ और मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है, इसलिए रंग-गुलाल का उत्सव 4 मार्च को मनाया जाएगा.
3 मार्च- चंद्रग्रहण का समय
सूतक प्रारंभ- सुबह 6.30 बजे
विरल छाया प्रवेश- दोपहर 2.14 बजे
ग्रहण मोक्ष- शाम 6.48 बजे
चंद्रोदय- लगभग 6.30 बजे
यह ग्रस्तोदय स्वरूप का चंद्रग्रहण रहेगा। भारत में इसका दृश्य प्रभाव सीमित होगा, किंतु पारंपरिक दृष्टि से जप, दान और साधना के लिए इसे श्रेष्ठ समय माना गया है। (समय पंचांग और स्थान भेद से परिवर्तनशील हो सकता है।)
मंदिरों में विशेष व्यवस्था
खजराना गणेश मंदिर के पुजारी सतपाल महाराज के अनुसार ग्रहण के दौरान मंदिर के पट सुबह 6.30 बजे बंद कर दिए जाएंगे और ग्रहण मोक्ष के बाद पुनः दर्शन शुरू होंगे.
परंपरा निभाने उमड़ी भीड़
होली पर गाय के गोबर से बनी माला- जिसे स्थानीय बोली में ‘ओला’ या ‘गुलगुल’ कहा जाता है- होलिका में अर्पित करने की परंपरा है. शहर में गोबर की सीमित उपलब्धता के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से व्यापारी विशेष रूप से यह सामग्री लेकर पहुंचे हैं.
गोबर का विशेष महत्व
इंदौर के विजय जगताप ने बताया कि सनातन परंपरा में गोबर का विशेष महत्व है. होली पर गोबर के कंडे और विभिन्न आकृतियों की मालाएं अर्पित की जाती हैं. शहर में गायों को खुले में रखने पर प्रतिबंध और गौशालाओं में व्यवस्थापन के कारण यह सामग्री आसानी से नहीं मिल पाती, इसलिए ग्रामीण व्यापारियों से खरीदनी पड़ती है.
गांव से आते हैं शहर में बेचने
देपालपुर के पास नेवरी चाकोड़ा से आए करण सोलंकी ने बताया कि वे खेती और दुग्ध व्यवसाय से जुड़े हैं, लेकिन होली के अवसर पर गोबर से बनी पारंपरिक मालाएं और कंडे शहर में बेचने आते हैं. इससे जहां परंपरा जीवित रहती है, वहीं ग्रामीणों को अतिरिक्त आय भी मिल जाती है. उन्होंने कहा कि वे नाम मात्र लाभ लेकर सामग्री उपलब्ध कराते हैं, ताकि लोगों की आस्था भी बनी रहे और उन्हें सुविधा भी मिले
