अफगानिस्तान में पत्नियों और बच्चों की पिटाई की अनुमति देने वाला कानून लागू

काबुल 20 फरवरी (वार्ता) अफगानिस्तान की तालिबान सरकार का नया कानून पत्नियों और अपने बच्चों की पिटाई की अनुमति देता है बशर्ते कि इस पिटाई के कारण हड्डियां नहीं टूटें और खुले जख्म नहीं हों। ‘दे महाकुमु जज़ाई उसूलनामा’ नामक 90 पन्नों के इस आपराधिक प्रक्रिया संहिता को तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने मंजूरी दी है। दस अध्यायों और 119 अनुच्छेदों वाले इस दस्तावेज़ में घरेलू हिंसा को कुछ खास शर्तों के साथ वैध करार दिया गया है। संहिता के अनुच्छेद 32 के तहत पतियों को पिटाई करने की इजाजत है, जबकि अनुच्छेद 34 के अनुसार एक शादीशुदा औरत को अपने शौहर की इजाजत के बिना माता-पिता के घर जाने पर तीन महीने तक की जेल हो सकती है।

यह नया कानून अफगान समाज को चार श्रेणियों में बांटता है जिसमें सजा का मात्रा, अपराध की गंभीरता के बजाय अपराधी की सामाजिक स्थिति के आधार पर तय होगी। सबसे ऊपरी श्रेणी में मौलाना या धार्मिक उपदेशक हैं जिन्हें शारीरिक दंड से छूट है और उनके लिए अधिकतम सजा केवल सलाह या चेतावनी भर है। दूसरे पायदान पर कबायली बुजुर्ग हैं जिन्हें केवल अदालती समन और सलाह देने की सजा है। मध्य वर्ग तीसरी श्रेणी में है जिन्हें मानक कारावास का सामना करना पड़ सकता है, जबकि चौथी श्रेणी यानी निचले वर्ग के लोगों को कारावास के साथ-साथ सार्वजनिक रूप से कोड़े मारने जैसे शारीरिक दंड दिए जा सकते हैं। यह दस्तावेज़ अफगानिस्तान की अदालतों में बांटा गया है, हालांकि इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। दस्तावेज़ के अनुसार अगर पति के पीटने से स्पष्ट रूप से हड्डी टूट जाती है या गंभीर चोट आती है, तो उसकी अधिकतम सजा केवल 15 दिन की जेल है। इसके अलावा किसी महिला को अदालत में दुर्व्यवहार साबित करने के लिए पूरी तरह से ढंके हुए रहकर जज को अपनी चोटें दिखानी होंगी और उसके साथ एक पुरुष अभिभावक का होना भी अनिवार्य है।

इस नयी संहिता ने हामिद करजई सरकार द्वारा 2009 में बनाए गए ‘महिलाओं के खिलाफ हिंसा उन्मूलन कानून’ को पूरी तरह समाप्त कर दिया है, जिसमें महिलाओं के खिलाफ किसी भी प्रकार की हिंसा को अपराध माना गया था और दोषियों के लिए सख्त सजा का प्रावधान था। वैश्विक स्तर पर इस नयी संहिता की कड़ी आलोचना हो रही है और इसे रद्द करने की मांग की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की विशेष दूत रीम अलसालेम ने इस संहिता के परिणामों को भयानक बताते हुए इसे तत्काल निरस्त करने का आह्वान किया है। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने भी इस पर चिंता व्यक्त की है क्योंकि यह कानून महिलाओं और समाज के निचले तबके के अधिकारों को पूरी तरह सीमित कर देता है।

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