हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी प्रभुत्व को रोकने के लिए एक मजबूत भारत जरूरी: एस पॉल कपूर

वाशिंगटन, 13 फरवरी (वार्ता) दक्षिण और मध्य एशियाई मामलों पर अमेरिका के सहायक विदेश मंत्री एस. पॉल कपूर ने घोषणा की है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी प्रभुत्व को रोकने के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र भारत जरूरी है। मंत्री ने संसदीय सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। संसदीय सुनवाई में दक्षिण और मध्य एशिया के रणनीतिक महत्व पर व्यापक सहमति दिखाई दी, हालांकि चीन के बढ़ते प्रभाव और राजनीतिक उथल-पुथल वाले इस क्षेत्र में अमेरिकी हितों को आगे बढ़ाने के तरीकों पर सांसद गहराई से विभाजित नजर आए। श्री कपूर ने स्पष्ट किया कि अमेरिका भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी नीति का उद्देश्य केवल चीन को रोकना नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र में संतुलन और संप्रभुता बनाये रखना है।

सुनवाई के दौरान व्यापार, कूटनीति और अफगानिस्तान नीति पर तीखे दलीय मतभेद हावी रहे। सांसदों ने इस पर बहस की कि अमेरिका को चीन के प्रभाव का मुकाबला कैसे करना चाहिए और दक्षिण एवं मध्य एशिया में तेजी से बदलते राजनीतिक बदलावों पर क्या प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
सत्र की शुरुआत करते हुए अध्यक्ष और प्रतिनिधि बिल हुइज़ेंगा ने कहा, “दक्षिण और मध्य एशिया उपसमिति की कार्यवाही शुरू की जाती है। इस सुनवाई का उद्देश्य दक्षिण मध्य एशिया में अमेरिका की विदेश नीति की जांच करना है।” उन्होंने इस क्षेत्र को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक बताया और कहा कि वहां अमेरिकी रणनीति अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक मजबूती और हमारी वैश्विक उपस्थिति की कुंजी है। श्री हुइज़ेंगा ने कहा कि दक्षिण और मध्य एशिया ‘लगभग दो अरब लोगों, गतिशील अर्थव्यवस्थाओं और रणनीतिक जलमार्गों का घर है जो भारत-प्रशांत में शक्ति संतुलन को आकार देते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि ‘हमारा जुड़ाव आने वाले दशकों के लिये एशिया में अमेरिका की भूमिका को परिभाषित करेगा।

अध्यक्ष ने आगाह किया कि चीन ‘अपनी ‘बेल्ट एंड रोड’ पहल के माध्यम से अपने सुरक्षा हितों को आगे बढ़ाने के लिये ‘दमनकारी ऋण’ देता है और छोटे देशों को कर्ज के जाल में फंसाता है।’ उन्होंने यह भी कहा कि चीन ने अपनी सैन्य आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करते हुए भारत, नेपाल और भूटान के साथ अपनी सीमाओं को मजबूत किया है।
श्री हुइज़ेंगा ने वैश्विक समुद्री तेल व्यापार के 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से का वहन करने वाले हिंद महासागर को ‘दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री गलियारों में से एक’ बताते हुए कहा कि ‘एक स्वतंत्र और खुला हिंद महासागर हमारी राष्ट्रीय और आर्थिक सुरक्षा के लिए प्राथमिकता है।’ उन्होंने डिएगो गार्सिया द्वीप समूह पर अमेरिकी नौसेना सुविधा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि क्षेत्र में अमेरिका की सैन्य मजबूती बनाए रखने से चीनी दबाव को रोकने, समुद्री डकैती को खत्म करने और अमेरिकी एवं विश्व

व्यापार के मुक्त प्रवाह को सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
श्री कपूर ने जोर देकर कहा कि अमेरिका टकराव नहीं चाहता, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कोई भी अकेली शक्ति एशिया पर हावी न हो सके। उन्होंने कहा, “हम मौलिक रूप से जो करने की कोशिश कर रहे हैं, वह चीन को क्षेत्र से बाहर रखना नहीं है, बल्कि चीन या किसी अन्य एकछत्र शक्ति को पूरे क्षेत्र पर कब्जा करने या दमनकारी प्रभाव डालने से रोकना है।” श्री कपूर ने उल्लेख किया कि भारत का आकार, भूगोल और बढ़ती क्षमताएं उसे शक्ति संतुलन को आकार देने के लिए एक अद्वितीय स्थिति में रखती हैं। उन्होंने कहा, “एक भारत जो स्वतंत्र होने, अपने लिए खड़े होने और अपनी कार्रवाई की स्वतंत्रता को बनाए रखने में सक्षम है, वह हिंद-प्रशांत के एक बड़े हिस्से को चीन को उस क्षेत्र की एकमात्र प्रभावी शक्ति बनने से रोकता है।”

आर्थिक लचीलापन, तकनीकी प्रगति और सैन्य ताकत को भारत की स्वतंत्रता के स्तंभ बताते हुए श्री कपूर ने कहा, “एक स्वतंत्र, मजबूत और समृद्ध भारत, एशिया प्रशांत के एक बड़े हिस्से को चीन से दूर ले जाता है और यह वास्तव में हमारे लिए एक रणनीतिक जीत है।” ये टिप्पणियां अमेरिका के रणनीतिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करती हैं। भारत को सशक्त बनाना केवल द्विपक्षीय सहयोग नहीं है, यह संतुलन बनाए रखने, दबाव को रोकने और हिंद-प्रशांत की भविष्य की व्यवस्था को आकार देने के लिए केंद्रीय है।
हालांकि, सदस्य सिडनी कामलागर-डोव ने प्रशासन के इस दृष्टिकोण की कड़ी आलोचना की और इसे ‘ट्रंप 2.0’ कहा। उन्होंने कहा, “श्री ट्रंप ने अमेरिकी क्षेत्रीय हितों को नुकसान पहुँचाया है और हमारे कूटनीतिक साधनों को नष्ट कर दिया है। अप्रैल में श्री ट्रंप ने दक्षिण और मध्य एशिया के भागीदारों पर आयात शुल्क की घोषणा की, जो उन देशों के लिए एक अप्रत्याशित आर्थिक झटका था जो पहले से ही चीन के कर्ज से जूझ रहे थे।”

सुश्री सिडनी ने कहा, “भारत पर 50 प्रतिशत आयात शुल्क ने द्विपक्षीय संबंधों में अनावश्यक दरार पैदा की और हमारे दोनों देशों के बीच दशकों की मेहनत से बने विश्वास की बलि दे दी। एक साल से अधिक समय तक बातचीत खिंचने के कारण हमें वार्षिक क्वाड शिखर सम्मेलन समय पर आयोजित करने का मौका गंवाना पड़ा और हिंद-प्रशांत में हमारी स्थिति कमजोर हुई।” श्री कपूर ने व्यापारिक तनाव की चिंताओं का जवाब देते हुए कहा कि भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका लगातार मजबूत सहयोग बनाए हुए हैं। उन्होंने कहा, “अमेरिका और भारत मंत्रिस्तरीय वार्ता जैसे उच्च-स्तरीय राजनयिक संपर्क बनाए हुए हैं और द्विपक्षीय रूप से तथा क्वाड के माध्यम से भी रक्षा, प्रौद्योगिकी और ऊर्जा क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में सहयोग मजबूत बना हुआ है। हमने अपने व्यापार संबंधों के पुराने मुद्दों को सुलझा लिया है। इसका प्रमाण नया 10-वर्षीय अमेरिका-भारत रक्षा ढांचा समझौता, ‘ट्रस्ट’ पहल और ड्रोन से लेकर लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) जैसे अमेरिकी उत्पादों की भारत द्वारा खरीद है।”
श्री कपूर ने भारत के साथ हालिया व्यापार ढांचे और बंगलादेश के साथ एक व्यापार सौदे का भी जिक्र करते हुए कहा कि प्रशासन क्षेत्रीय भागीदारों के बीच ‘रणनीतिक क्षमता’ बनाने के लिए ‘रक्षा सहयोग, लक्षित निवेश और कूटनीति’ का उपयोग कर रहा है।

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