रक्त पर शिकंजा कसा तो प्लाज्मा-प्लेटलेट्स का खेल शुरु

सतना : थैलेसेमिया से पीडि़त बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ाए जाने के कथित आरोप सामने आने पर 2 महीने पहले रक्त कोष प्रभारी सहित टेक्रीशियंस को निलंबित किए जाने की कार्रवाई सामने आई थी. हलांकि जिले से लेकर राज्य व राष्ट्रीय स्तर की टीम द्वारा की गई जांच में कुछ भी स्पष्ट तरीके से सामने नहीं आ पाया. लेकिन मामले की हनक से रक्त की कालाबाजारी पर काफी हद तक अंकुश लगा रहा.

वहीं अब धीरे-धीरे मामले के ठंडा होने से निगरानी घटने लगी है. जिसका फायदा उठाते हुए चोरी छिपे ब्लड कंपोनेंट्स की ब्रिकी का खेल शुरु हो गया है.जिला चिकित्सालय में भर्ती किसी मरीज को यदि रक्त चढ़ाए जाने की आवश्यकता होती है तो ब्लड बैंक में किसी डोनर के जरिए रक्त देने के बाद ही उसे रक्त मिल पाता है. इसी तरह निजी नर्सिंग होम्स अथवा अस्पताल में भर्ती मरीजों को भी डोनर द्वारा एक्सचेंज में रक्त दिए जाने के बाद ही जिला चिकित्सालय के रक्त कोष से खून मिलता है.

पुरानी व्यवस्था के अंतर्गत रक्त के जरुरतमंद मरीजों को होल ब्लड चढ़ाया जाता था. लेकिन ठेका प्रथा के जरिए आधुनिक मशीनों का संचालन शुरु होने के बाद अब ब्लड कंपोनेंट्स अलग अलग कर लिए जाते हैं. रक्त को सेंट्रीफ्यूगल मशीन में रखने के कुछ समय बाद पीआरबीसी और प्लाज्मा अलग अलग हो जाते हैं. पीआरबीसी को अलग करने के बाद प्लाज्मा को फिर मशीन में रखते हुए प्लेटलेट्स अलग कर ली जाती है.

इस तरह होल ब्लड से पीआरबीसी, प्लाज्मा और प्लेटलेट्स जैसे 3 कंपानेंट्स अलग हो जाते हैं. गंभीर एनीमिक, सीजेरियन केस सहित अन्य गंभीर मरीजों को पीआरबीसी चढ़ाया जाता है. जबकि डेंगू-मलेरिया से पीडि़त मरीजों को केवल प्लेटलेट्स चढ़ाई जाती है. वहीं आग से जलकर घायल हुए मरीजों के रक्त में पानी की कमी होने के कारण उपचार के सा-साथ प्लाज्मा चढ़ाया जाता है. चूंकि रक्त के मुख्य अवयव माने जाने वाले गाढ़े पीआरबीसी की मांग सबसे अधिक होती है.

इसलिए इसके आदान-प्रदान को लेकर रक्त कोष में विशेष निगरानी की जाती है. जबकि प्लाल्मा और प्लेटलेट्स की मांग अपेक्षाकृत कम होती है इसलिए उस पर विशेष तवज्जो नहीं दी जाती. इसके साथ ही इस मामले में एक और कारक भी महत्वपूर्ण माना जाता है वह है ब्लड कंपोनेंट्स का जीवनकाल. पीआरबीसी का जीवनकाल जहां लगभग महीने भर का होता है. वहीं प्लाज्मा 7-10 दिन और प्लेटलेट्स महज 5 दिन तक ही जीवित रह पाती है.

जीवनकाल समाप्त होते ही ब्लड कंपोनेंट्स को डिसपोज करना अनिवार्य होता है. जिसे ऑफिसियल रिकार्ड में दर्शाया भी जाना चाहिए. लिहाजा निगरानी का आभाव और कम दिनों का जीवनकाल जैसी परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए चोरी छिपे उनकी ब्रिकी कर दी जाती है. प्लेटलेट्स को जहां 1500 से लेकर 2000 रु प्रति पैक के हिसाब से बेच दिया जाता है. वहीं प्रति पैक प्लाज्मा की कीमत 500 से 700 के बीच बनी रहती है.
 फ्री एडवाइस के बावजूद यह हाल
जिला चिकित्सालय में भर्ती मरीजों को यदि प्लेटलेट्स अथवा प्लाज्मा की आवश्यकता होती है तो संबंधित चिकित्सक द्वारा अमूमन ऐसे सभी मरीजों के पर्चे पर फ्री एडवाइस की टीप लगा दी जाती है. जिसे लेकर मरीज के परिजन जब रक्त कोष पहुंचते हैं तो वहां मौजूद अमले द्वारा तरह तरह के नियमों का हवाला देकर टालमटोल शुरु कर दी जाती है. प्लाज्मा-प्लेटलेट्स के लिए परेशान परिजनों को बार बार भटकता देख अस्पताल के कुछ कर्मचारी सक्रिय हो जाते हैं.

वे फौरन संपर्क साधते हुए बरगलाकर किसी तरह परिजनों प्लाज्मा-प्लेटलेट्स खरीदने के लिए राजी कर लेते हैं. जिसके कुछ समय बाद ही परिजनों को प्लाज्मा-प्लेटलेट्स उपलब्ध हो जाती है. यानी रक्त कोष के रिकार्ड में फ्री एडवाइस दर्ज होने के बावजूद उसकी अवैध वसूली कर ली जाती है. इसी कड़ी में नियमानुसार निजी नर्सिंग होम्स-अस्पताल में भर्ती मरीजों को प्लाज्मा-प्लेटलेट्स तभी मिलता है जब उनके परिजनों द्वारा एक्सचेंज में रक्त दिया जाता है. लेकिन कुछ नर्सिंग होम्स के स्टाफ से रक्त कोष कर्मियों की मिलीभगत से बिना एक्सचेंज के ही प्लाज्मा-प्लेटलेट्स उपलब्ध हो जाती है

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