
जबलपुर। ईर्ष्या की भावना दूसरों की प्रगति और प्रशंसा को सहन नहीं कर पाती—यह विचार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने प्रातःकालीन धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति दूसरों की तुलना में स्वयं को देखता रहेगा, तब तक वह अपने जीवन को संवार नहीं सकता। दूसरों की ओर देखने से मन में चुभन और ईर्ष्या जन्म लेती है। मुनि श्री ने कहा कि यदि किसी की उन्नति देखकर हर्ष होता है तो वह प्रेम का संकेत है, लेकिन यदि मन में जलन हो तो समझना चाहिए कि ईर्ष्या सक्रिय है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईर्ष्या प्रायः निकट संबंधों में ही होती है—भाई से भाई, पड़ोसी से पड़ोसी, व्यापारी से व्यापारी, यहां तक कि साधु से साधु तक। उन्होंने कहा कि स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास ही अहंकार की शुरुआत है। आज धार्मिकता तो बढ़ी है, लेकिन आध्यात्मिकता का अभाव दिखाई देता है। गुणग्राही दृष्टि, सकारात्मक सोच, कर्म सिद्धांत में विश्वास और आध्यात्मिक दृष्टि से ही जीवन का कल्याण संभव है।
आज घटयात्रा एवं श्रीजी की शोभायात्रा
प्रवक्ता अविनाश जैन (विद्यावाणी) एवं सुबोध कामरेड ने कार्यक्रम की जानकारी देते हुए बताया कि आज को दोपहर 12:30 बजे मुनिसंघ के सान्निध्य में घटयात्रा एवं श्रीजी की शोभायात्रा डी.एन. जैन बोर्डिंग से प्रारंभ होकर श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान स्थल, टेलीग्राफ ग्राउंड पहुंचेगी, जहां ध्वजारोहण एवं पंडाल का उद्घाटन होगा। 31 जनवरी से 8 फरवरी तक प्रतिदिन प्रातः 6:30 बजे मंगलाष्टक, शांतिमंत्र एवं शांतिधारा के साथ विधान संपन्न होंगे।
