अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का पहला साल वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल भरा रहा है। ट्रंप ने गाजा में “शांति बोर्ड” के गठन की घोषणा की है, जिसकी कमान स्वयं उनके हाथों में होगी। इसे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने शांति के मुखौटे में छिपा हुआ कब्जा करार दिया है। वहीं, वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई के जरिए राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और अमेरिकी तेल कंपनियों को वहां के संसाधनों का प्रबंधन सौंपने के फैसले ने सनसनी फैला दी है। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा अब दूसरे देशों के संसाधनों पर सीधे नियंत्रण की रणनीति में बदल चुका है।
ट्रंप की विस्तारवादी नीतियों की जद में केवल शत्रु देश ही नहीं, बल्कि मित्र राष्ट्र भी आ रहे हैं। उन्होंने ग्रीनलैंड को खरीदने या सैन्य बल से हथियाने की अपनी पुरानी जिद को फिर से दोहराया है, जिसे डेनमार्क ने संप्रभुता का अपमान बताया है। इतना ही नहीं, ट्रंप ने कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की धमकी देकर नाटो सहयोगियों के बीच भी खलबली मचा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह व्यवहार 19वीं सदी की उस औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है, जहाँ शक्तिशाली देश छोटे राष्ट्रों की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करते थे।
वैश्विक विश्लेषक ट्रंप की आर्थिक और विदेश नीतियों की तुलना “ईस्ट इंडिया कंपनी” के उदय से कर रहे हैं। जहाँ व्यापारिक लाभ और रणनीतिक प्रभुत्व के लिए संप्रभु देशों की सीमाओं और कानूनों को दरकिनार किया जा रहा है। रूस और चीन के खिलाफ रणनीतिक रक्षा कवच तैयार करने के नाम पर ट्रंप प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय नियमों को चुनौती दी है। ट्रंप के इन आक्रामक फैसलों ने अमेरिका की छवि एक नियमबद्ध लोकतंत्र के बजाय एक अनिश्चित और विस्तारवादी महाशक्ति के रूप में पेश की है, जिससे भविष्य में वैश्विक संघर्षों का खतरा और बढ़ गया है।

