‘अजीब प्रक्रियाओं’ के साथ हो रहा बंगाल एसआईआर, व्हाट्सऐप पर भेजे जा रहे दिशानिर्देश

नयी दिल्ली, 12 जनवरी (वार्ता) वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय में कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में ‘बेहद अजीब’ प्रक्रियाओं का पालन हो रहा था और एसआईआर से जुड़े गंभीर दिशानिर्देशों का आदान-प्रदान व्हाट्सऐप के ज़रिये हो रहा था।

श्री सिब्बल ने एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकार्ताओं का पक्ष रखते हुए कहा कि जिस तरह से यह प्रक्रिया की जा रही है, उससे ‘बेतुकी विसंगतियां’ उजागर हुई हैं और न्यायिक जांच ज़रूरी है।

चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने इसका जवाब दाखिल करने के लिये समय मांगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने आयोग को सभी याचिकाओं के लिये एक आम जवाब दाखिल करने का आदेश दिया।

आयोग ने दिसंबर में उच्चतम न्यायालय से कहा था कि तत्कालीन एसआईआर के दौरान पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम बड़े स्तर पर हटाने के आरोप ‘बढ़ा-चढ़ाकर लगाये गये थे’ और कुछ खास राजनीतिक हितों के लिये यह मुद्दा उठाया गया था।

चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस सांसद डोला सेन द्वारा दायर एक जनहित याचिका के जवाब में 24 जून और 27 अक्टूबर के एसआईआर आदेश का बचाव करते हुए कहा कि मतदाता सूची कि सटीकता और पवित्रता के लिये यह प्रक्रिया ज़रूरी है।

चुनाव आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 15, 21 और 23 का हवाला देते हुए जरूरत पड़ने पर एसआईआर करने की अपनी शक्ति पर ज़ोर दिया। आयोग ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ऐसे अभ्यास 1950 के दशक से भारत के चुनावी ढांचे का हिस्सा रहे हैं।

आयोग ने पिछले उदाहरणों का हवाला देते हुए बताया कि देशव्यापी एसआईआर 1962-66, 1983-87, 1992-93, 2002 और 2004 के दौरान किए गए थे। आयोग ने कहा कि मौजूदा अभ्यास उसी संवैधानिक जनादेश का विस्तार है। एसआईआर से असली मतदाताओं के मताधिकार छीन लिए जाने के दावों को खारिज करते हुए, आयोग ने कहा कि आरोप “गलत थे और पूरी तरह से खारिज किए जाते हैं।”

आयोग ने कहा कि उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी भी मतदाता का नाम हटाया नहीं जा सकता है और एसआईआर दिशानिर्देशों में गलत तरीके से नाम हटाने से रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं। आयोग ने न्यायालय को बताया कि पश्चिम बंगाल में मौजूदा 99.77 प्रतिशत मतदाताओं को पहले से आधे-भरे हुए जनगणना फॉर्म दिए जा चुके हैं। आयोग को 70.14 प्रतिशत पूरे-भरे हुए फॉर्म वापस भी मिल गये हैं। आयोग के अनुसार, ये आंकड़े बताते हैं कि बड़े पैमाने पर मताधिकार छीनने के आरोप निराधार हैं।

आयोग ने कहा कि जो मतदाता अस्थायी रूप से घर से दूर हैं, वे परिवार के सदस्यों के माध्यम से फॉर्म जमा कर सकते हैं या चुनाव आयोग के पोर्टल या मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग करके उन्हें ऑनलाइन फाइल कर सकते हैं। आयोग ने उच्चतम न्यायालय को यह भी आश्वासन दिया कि यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष निर्देश जारी किए गए हैं कि बुजुर्ग मतदाताओं, विकलांग व्यक्तियों और अन्य कमजोर समूहों को संशोधन प्रक्रिया के दौरान आवश्यक सहायता मिले।

वर्तमान याचिकाकर्ताओं के अलावा, पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस समिति और तृणमूल सांसद डोला सेन और माला रॉय ने भी चल रहे एसआईआर अभ्यास के खिलाफ राहत के लिए उच्चतम न्यायालय का रुख किया है। कांग्रेस के वकील ने बताया कि कई नागरिकों ने पार्टी से संपर्क करके संशोधन के संचालन के बारे में चिंता जताई थी, जिसके बाद न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करने का कदम उठाया गया। चुनाव आयोग का जवाब दाखिल होने के बाद उच्चतम न्यायालय अगले सप्ताह मामले की सुनवाई करेगा।

 

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