ग्वालियर चंबल डायरी
हरीश दुबे
जब से ग्वालियर कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर सुरेन्द्र यादव विराजे हैं, तभी से उनकी अपनी ही पार्टी के कद्दावर विधायक डॉ. सतीश सिंह सिकरवार से दूरियां राजनीतिक हलकों में चर्चा का सबब बनती रही हैं। अध्यक्ष बनने के बाद से ही नए सदर ने विधायक के साथ मंच साझा नहीं किया। पार्टी के स्थापना दिवस पर सतीश ने तोरण वाटिका में शहर के सैकड़ों पुराने नेताओं, कार्यकर्ताओं का सम्मान समारोह रखा तो पार्टी के शहर सदर ने बुलाने पर भी तशरीफ फरमाने की जहमत नहीं की। कह दिया कि कहीं व्यस्त हैं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से पैगाम भी भिजवा दिया कि यह समानांतर कार्यक्रम है क्योंकि पार्टी की तरफ से आधिकारिक सम्मान समारोह तो कांग्रेस दफ्तर पर ही रखा गया था।
बहरहाल, दोनों ओर से रार और तकरार ठनी हुई थी, इससे पहले कि पार्टी के मनमुटाव घर और दफ्तर की दहलीज लांघें, करीब पंद्रह साल तक सूबे के चार वजीरेआलाओं की सरकार में वजनदार मिनिस्टर और पार्टी के कार्यकारी प्रदेशाध्यक्ष रह चुके बालेंदु शुक्ला ने सीजफायर की कमान संभाली। उन्होंने अपने बंगले पर दोनों नेताओं को बुलाया, दो घंटे तक दोनों नेता एक दूसरे के प्रति शिकायतें दर्ज कराते रहे और फिर गले मिलकर एकजुट हो गए। चूंकि बालेंदु ने मिनिस्टर और कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके दो और बड़े नेताओं भगवान सिंह यादव और चंद्रमोहन नागौरी को भी बुलवा रखा था, लिहाजा दोनों लीडरान के गिले शिकवे दूर करने के लिए बालेंदु को ज्यादा मशक्कत नहीं करना पड़ी। अब देखना है कि झांसी रोड से शुरू हुई यह पहल ललितपुर कॉलोनी और विजयनगर को कितना करीब लाती है।
लेकिन श्योपुर में सीताराम और रामनिवास के दल मिले, दिल नहीं
ग्वालियर जैसी ही इबारत श्योपुर के सियासी अक्श पर पढ़ी जा सकती है। यहां भाजपा के दो बड़े नेता टकरा गए हैं। दोनों ही विधायक रह चुके हैं। एक तो कई दफा मिनिस्टर रहे हैं और दूसरे को अभी भी मंत्री का दर्जा हासिल है। हम बात कर रहे हैं रामनिवास रावत और सीताराम आदिवासी की। मोर्चा सीताराम ने खोला है और रामनिवास फिलहाल डिफेंसिव मोड में हैं। सीताराम को इस बात का दर्द है कि सहरिया विकास प्राधिकरण के प्रदेश उपाध्यक्ष के नाते वे अभी भी राज्यमंत्री का ओहदा रखते हैं जबकि रामनिवास उपचुनाव हारने के बाद से अब किसी सरकारी ओहदे पर नहीं हैं, तब भी प्रशासन से लेकर सरकार तक में रामनिवास को ही तवज्जो मिल रही है और उन्हें हाशिए पर पटख दिया गया है।
उन्हें इस बात का रंज है कि प्रशासन जिले में होने वाली बैठकों में उनके बजाए रामनिवास को ही बुलाता है और सीएम भी अपने दौरों में रामनिवास को ही अहमियत देते हैं। वे दम ठोककर कहते हैं कि रावत समाज के दस पंद्रह हजार वोटों से चुनाव नहीं जीता जा सकता है, उनके आदिवासी समाज ने ही मुरैना श्योपुर सीट पर भाजपा के सांसद को जिताया है। उधर रामनिवास रावत का कहना है कि वे न तो सरकार और प्रशासन हैं और न संगठन के ओहदेदार, लिहाजा सीताराम की आपत्तियों का जवाब नहीं दे सकते। विजयपुर सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस के मुकेश मल्होत्रा ने भाजपा के रामनिवास रावत को हरा दिया था, इसके बाद रावत को फॉरेस्ट की मिनिस्ट्री छोड़ना पड़ी थी। रावत ने कांग्रेस के विजयी विधायक के खिलाफ चुनाव याचिका दायर कर रखी है। कोर्ट का जो भी नतीजा आए लेकिन दोनों पूर्व विधायक रावत और सीताराम अपनी तैयारियों में मशगूल हैं, इन रंजोगम और तोहमतों के सिलसिला को आने वाली संभावित सियासी चुनौतियों से जोड़कर देखा जा रहा है।
जेयू में जो हो जाए वह कम, अधिकारी दस साल से गैरहाजिर
ग्वालियर की जीवाजी यूनिवर्सिटी में जो हो जाए, कम है। एक महिला अधिकारी बीते दस साल से नौकरी से गैरहाजिर चल रही थीं, उन्हें अब जाकर बर्खास्त किया गया है। बर्खास्तगी का ऑर्डर भी उनके रिटायरमेंट से एक दो रोज पहले जारी किया गया। जेयू में कई ऐसे कर्मचारी हैं जो वर्किंग हवर्स में तो काम नहीं करते लेकिन छुट्टी के दिन आकर पेंडिंग काम निपटाने के नाम पर हजारों रुपए का भत्ता ले लेते हैं। जेयू में निजाम बदला है तो अब कुछ सख्ती भी की जा रही है, मसलन छुट्टी के दिन आकर पेंडिंग काम निपटाने वालों को पहले यह बताना होगा कि उन्होंने क्या काम किया, तभी भत्ता नसीब होगा यानि घल्लूघारा बंद।
आर्यमन: अंचल की भविष्य की राजनीति के संकेत
सिंधिया परिवार के चश्मों चिराग महाआर्यमन एमपीसीए के अध्यक्ष बनने के बाद पहली दफा ग्वालियर और शिवपुरी आए तो उनके इस्तकबाल में नौजवान टीम की भीड़ उमड़ पड़ी। आर्यमन अभी एक्टिव पॉलिटिक्स में नहीं हैं लेकिन रोडशो की कामयाबी ने राजनीतिक विश्लेषकों को ग्वालियर की भविष्य की राजनीति के संकेत जरूर दे दिए। बहरहाल, चिंताजनक बात यह है कि रोडशो की कामयाबी की खुशी तब काफ़ूर हो गई जब वे शिवपुरी में रोडशो के दौरान ज़ख्मी हो गए और उन्हें चंदेरी, अशोकनगर, गुना के कार्यक्रम कैंसिल कर इलाज के लिए दिल्ली लौटना पड़ा। वे समर्थकों से कह गए हैं कि सेहत सुधरते ही फिर आएंगे, दौरा वहीं से शुरू होगा जहां छोड़ा था।
