ऑपरेशन सिंदूर पर पश्चिमी देशों की दोहरी नीति पर सवाल उठाए जयशंकर ने

लक्ज़मबर्ग 07 जनवरी (वार्ता) विदेश मंत्री डा. एस.जयशंकर ने लेटिन अमेरिका के घटनाक्रम का परोक्ष रूप से जिक्र करते हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पश्चिमी देशों के दोहरे मानदंडों की बुधवार को कड़ी आलोचना की। डा. जयशंकर ने भारतीय समुदाय के लोगों के साथ बातचीत में भारत और लक्ज़मबर्ग के बीच मजबूत साझेदारी पर आधारित संबंधों पर भी जोर दिया। बातचीत के दौरान विदेश मंत्री ने उन देशों पर निशाना साधा जो भारत को क्षेत्रीय तनावों पर उपदेश देते हैं लेकिन अपने ही क्षेत्रों में हो रही हिंसा और जोखिमों को नज़रअंदाज़ करते हैं।

उन्होंने कहा, “कभी-कभी लोग कहते हैं, जैसे ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कहा गया। अब अगर आप उनसे पूछें कि सच में आपको चिंता है, तो क्यों न आप अपने ही क्षेत्र को देखें? और खुद से पूछें कि वहां हिंसा का स्तर क्या है, कितने जोखिम उठाए गए हैं और हममें से बाकी लोग आपके कार्यों को लेकर कितने चिंतित हैं। लेकिन यही दुनिया की प्रकृति है। लोग जो कहते हैं, वह हमेशा वही नहीं होता जो वे करते हैं, और हमें इसे उसी भावना के साथ स्वीकार करना पड़ता है। डा. जयशंकर की टिप्पणियों से उन देशों के प्रति उनकी नाराज़गी झलकी जो ऐसे संघर्षों पर अनचाही सलाह देते हैं जिन्हें वे ठीक से समझते भी नहीं। उन्होंने कहा कि दूर बैठे देश अक्सर “बिना जटिलताओं को समझे या अपने रणनीतिक हितों पर विचार किए” बोलते हैं।

उन्होंने कहा, “अब दुनिया के बाकी हिस्सों में हो रहे घटनाक्रमों का इस पर कितना असर पड़ता है, यह कहना मुश्किल है। दूर बैठे लोग बातें करेंगे, कभी सोच-समझकर, कभी बिना सोचे, कभी अपने स्वार्थ में, तो कभी लापरवाही से। आज के समय में देश अधिक आत्मकेंद्रित हो रहे हैं और वही करेंगे जिससे उन्हें सीधा लाभ हो। वे आपको मुफ्त की सलाह देते रहेंगे।” विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत का रुख इस बात पर निर्भर करता है कि वह किससे निपट रहा है। उन्होंने कहा, “भारत उन देशों के साथ सकारात्मक और रचनात्मक रूप से जुड़ने को तैयार है जो नई दिल्ली के साथ सकारात्मक तरीके से काम करना चाहते हैं, लेकिन जो पाकिस्तान की तरह व्यवहार करते हैं, उनसे अलग ढंग से निपटना पड़ता है।”

पश्चिमी देशों की कथित दोहरी नीति की आलोचना से आगे बढ़ते हुए डा. जयशंकर ने भारत और लक्ज़मबर्ग के बीच 78 वर्षों पुराने मजबूत और विकसित होते संबंधों को भी रेखांकित किया।
उन्होंने कहा, “हमने एक लंबा सफर तय किया है और हम लक्ज़मबर्ग को न केवल अपने आप में एक बहुत महत्वपूर्ण साझेदार मानते हैं, बल्कि यूरोपीय संघ के संदर्भ में भी, खासकर ऐसे समय में जब यूरोपीय संघ के साथ हमारे अपने संबंध भी एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं।” उन्होंने कहा, “इस व्यापक रिश्ते को आकार देने में आपका जो प्रभाव है, जो समर्थन आप देते हैं, वह हमारे लिए बहुत मूल्यवान है। कई मायनों में आप भारत और यूरोपीय संघ के बीच संबंधों को गहरा करने के समर्थक रहे हैं।”भारतीय समुदाय के लोगों के साथ बातचीत के बाद विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा , ” आज लक्ज़मबर्ग में भारतीय समुदाय के सदस्यों से मिलकर खुशी हुई। राजनीतिक, व्यापार और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में लक्ज़मबर्ग के साथ हमारी साझेदारी के उल्लेखनीय विस्तार को रेखांकित किया। भारत–लक्ज़मबर्ग संबंधों को मजबूत करने में हमारे प्रवासी समुदाय के योगदान की सराहना करता हूँ।”

उन्होंने यूरोप के साथ भारत की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि का अनुमान जताया और इसे वैश्विक व्यवस्था में एक बार फिर से संतुलन का दौर बताया। उन्होंने कहा, “हर देश, हर क्षेत्र अपने हितों और गणनाओं का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है और यह देख रहा है कि हम क्या कर सकते हैं। भारत और यूरोपीय संघ को और करीब लाने की दिशा में मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि 2026 में यूरोप के साथ संबंधों में तेजी देखने को मिलेगी।”

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