
बालाघाट। जिले के किसान अब पराली जलाने के बजाय उसके वैज्ञानिक एवं पर्यावरण‑अनुकूल प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उपसंचालक कृषि फूलसिंह मालवीय ने बताया कि जिले के किसान आधुनिक कृषि यंत्रों के माध्यम से पराली का प्रबंधन कर रहे हैं, जिससे न केवल पर्यावरण संरक्षण हो रहा है बल्कि भूमि की उर्वरता भी बनी रहती है।
जिला मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर दूर ग्राम मांझापुर, विकासखंड लालबर्रा के कृषक राजकुमार सोनगड़े ने अपने 6 एकड़ धान की फसल की हार्वेस्टर से कटाई‑गहाई के पश्चात खेतों में फैली पराली को बेलर मशीन के माध्यम से बेल/गट्ठा बनाकर सफल पराली प्रबंधन किया है। कृषक सोनगड़े ने बताया कि वे आगामी रबी सीजन में गेहूं की फसल की बुआई सुपर सीडर के माध्यम से करेंगे। कृषक राजकुमार सोनगड़े के अनुसार एक एकड़ में लगभग 90 से 100 गट्ठे तैयार होते हैं, जिन पर प्रति गट्ठा लगभग 50 रुपये की लागत आती है। मात्र 15 मिनट में एक एकड़ खेत की पराली को गट्ठा अथवा बंडल बनाकर खेत से हटाया जा सकता है। प्रत्येक बंडल का वजन लगभग 30 से 35 किलोग्राम होता है तथा इसका आकार आयताकार होता है। कृषक की इस जागरूक पहल से अन्य किसान भी पराली प्रबंधन अपनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।
धान की पराली (पैरा) के प्रबंधन हेतु कृषि अभियांत्रिकी विभाग द्वारा महत्वपूर्ण योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं के अंतर्गत पराली को बेल बनाकर जीरो टिलेज तकनीक से रबी फसलों की बुआई सुपर सीडर, स्मार्ट सीडर एवं हैप्पी सीडर जैसे यंत्रों से की जाती है। इससे पराली जलाने की समस्या समाप्त होती है तथा पैरा को खेत में मिलाकर जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
उपसंचालक कृषि मालवीय ने बताया कि जिले के वे किसान जिनके पास 50 हॉर्स पावर अथवा उससे अधिक क्षमता का ट्रैक्टर है, वे हैप्पी सीडर, स्मार्ट सीडर एवं सुपर सीडर अनुदान पर क्रय कर सकते हैं। हैप्पी सीडर की कीमत लगभग 2.5 से 3 लाख रुपये है, जिस पर 50 प्रतिशत अथवा अधिकतम 1.20 लाख रुपये तक का अनुदान देय है। स्मार्ट सीडर की कीमत लगभग 2.25 लाख रुपये है, जिस पर 50 प्रतिशत अथवा अधिकतम 81,400 रुपये का अनुदान उपलब्ध है। इसी प्रकार सुपर सीडर की अनुमानित लागत 2 से 2.50 लाख रुपये है, जिस पर 50 प्रतिशत अथवा अधिकतम 86,400 रुपये का अनुदान देय है।
