भोपाल: सरोजिनी नायडू शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में सोमवार से सात दिवसीय गोंडी नृत्य कार्यशाला की शुरुआत हुई। कार्यशाला के पहले दिन ही परिसर में जनजातीय संस्कृति की जीवंत ऊर्जा देखने को मिली। छात्राओं में इस पारंपरिक नृत्य शैली को सीखने का उत्साह साफ नजर आया। आयोजन लोककला और बोली विकास अकादमी भोपाल और महाविद्यालय के संयुक्त सहयोग से किया गया।
इस अवसर पर गोंड समुदाय के वरिष्ठ कलाकारों ने प्रतिभागियों को नृत्य की मूल मुद्राएं सिखाईं। उन्होंने छात्राओं को हर नृत्य भाव लोककथा और सामुदायिक पहचान को समझाया। कलाकारों ने परंपरागत वाद्ययंत्रों और पहनावे की महत्ता पर भी जानकारी दी। इस अवसर पर छात्राओं को बताया गया कि जनजातीय नृत्य केवल प्रदर्शन नहीं बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने का माध्यम भी है।
महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ दीप्ति श्रीवास्तव ने कहा कि जनजातीय नृत्य हमारी सांस्कृतिक पूंजी है। इसे सीखकर छात्राएं एक नई कला में दक्ष बन सकती हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में नृत्य समूह बनाकर इससे रोजगार के अवसर भी प्राप्त हो सकते हैं।लोककला और बोली विकास अकादमी के निदेशक डॉ धर्मेंद्र पारे ने इस अवसर पर कहा कि इस तरह की कार्यशालाएं प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने में मदद करती हैं। उन्होंने बताया कि नई पीढ़ी तक पारंपरिक कला पहुंचाना समय की जरूरत है।
