जबलपुर: जिले में धान उपार्जन प्रक्रिया को लेकर प्रशासन की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। धान खरीदी के लिए 55 प्रतिशत नए और 45 प्रतिशत पुराने बारदाने का उपयोग किया जाना है। पुराने बारदाने की आपूर्ति अनुबंधित राइस मिलों से होती है, लेकिन यही तथ्य अब विवाद का कारण बन गया है। पिछले वर्ष धान हेराफेरी के मामले में जिले में बड़ी कार्रवाई हुई थी।
16 राइस मिलरों पर एफआईआर दर्ज की गई थी और 27 मिलरों पर विभागीय जांच जारी है। इसी कारण इन मिलरों को इस बार मिलिंग प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। इसके बावजूद प्रशासन इन्हीं मिलरों से पुराना बारदाना जमा करवा रहा है, जिसका उपयोग धान खरीदी में होना है। सवाल यह उठ रहा है कि जिन मिलरों पर हेराफेरी के आरोप लगने के कारण विश्वास नहीं किया जा सकता, उनसे बारदाना कैसे लिया जा रहा है? और यदि उनसे बारदाना लिया जा सकता है, तो मिलिंग का काम क्यों नहीं सौंपा जा रहा?
स्थानीय मिलिंग रुकी, बाहर के जिलों को मौके वर्तमान में जबलपुर के अधिकांश मिलरों को मिलिंग प्रक्रिया से बाहर रखा गया है और केवल पांच स्थानीय मिलर ही सीमित मात्रा में मिलिंग कर रहे हैं। इसके विपरीत, दूसरे जिलों के मिलरों को जबलपुर की धान ले जाने की अनुमति दी गई है, जिससे शासन को अतिरिक्त परिवहन व्यय का बोझ उठाना पड़ रहा है।
बारदाना ले सकते तो मिलिंग क्यों नहीं करवा रहे..?गोदामों में पिछले वर्ष की पुरानी धान पहले से ही भरी हुई है। दूसरे जिलों के मिलरों की कम रुचि और गोदामों में धान की भरमार के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जांच का सामना कर रहे मिलरों से बारदाना लिया जा सकता है, तो उनसे मिलिंग क्यों नहीं करवाई जा सकती? इसके बावजूद शासन न तो स्थानीय मिलरों को शामिल कर रहा है और न ही कोई स्पष्ट नीति घोषित कर पा रहा है।
