टीईटी पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का मुद्दा लोकसभा में गूंजा

नयी दिल्ली, 04 दिसंबर (वार्ता) लोकसभा में गुरुवार को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) के मामले में उच्चतम न्यायालय के हाल के फैसले से देश के करीब 25 लाख शिक्षकों के भविष्य अधर में लटकने का मामला उठाया गया और सरकार से अध्यादेश लाकर शिक्षकों को राहत देने की मांग की गयी।
शिव सेना के धैर्यशील संभाजीराव माने ने शून्यकाल के दौरान कहा कि देश भर के शिक्षकों के प्रश्न को आज बहुत ही गंभीरता से देखने की जरूरत है। उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर देश के 25 लाख शिक्षकों का भविष्य निर्भर है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) लागू होने के बाद शिक्षक पात्रता परीक्षा को लागू किया गया जिसमें पहले भर्ती किये गये शिक्षक इस परीक्षा से बाहर थे लेकिन अब देश भर के सभी शिक्षक जो 53 साल से नीचे के हैं उनके लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा देना अनिवार्य किया गया है। अगर कोई शिक्षक पात्रता परीक्षा पास नहीं करेगा तो उसे नौकरी से हटा दिया जाएगा। केंद्र सरकार से आग्रह है कि यह सभी शिक्षक अपनी स्थानिक परीक्षा पास करके भर्ती हुए हैं तो केंद्र सरकार उनकी तरफ से पार्टी बनकर उच्चतम न्यायालय में जाये ताकि शिक्षकों के साथ कोई अन्याय नहीं हो।
समाजवादी पार्टी के धर्मेन्द्र यादव ने कहा कि टीईटी के माध्यम से पूरे देश के तकरीबन 25 लाख और अकेले उत्तर प्रदेश के दो लाख शिक्षक असुरक्षा के भाव में है। अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के आने के बाद यह तय हुआ कि टीईटी की परीक्षा पास करने के बाद ही कोई शिक्षक बन पायेगा लेकिन उससे पहले के शिक्षकों के लिए यह प्रावधान था कि वे पहले की सेवा शर्तों के हिसाब से ही काम करते रहेंगे, उनको कोई परीक्षा नहीं देनी होगी लेकिन एक सिंतंबर 2025 को उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय आया। केंद्र सरकार और राज्य सरकार की कमजोर पैरोकारी के कारण देश के पचीस लाख शिक्षकों का भविष्य अधर में लटक गया है। सरकार को इस मामले में अध्यादेश लाकर शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करना चाहिए।
कांग्रेस के चमाला कुमार रेड्डी और समाजवादी पार्टी के लालजी वर्मा ने शिक्षकों से जुड़े इस मुद्दे को उठाया और सरकार से क़ानून लाकर शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने की माँग की।

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