वैश्विक जलवायु संतुलन में भारत की निर्णायक भूमिका

ब्राजील के बेलेम में चल रहे कोप 30 सम्मेलन में भारत ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि जलवायु संकट से निपटने का रास्ता “जलवायु न्याय” और “साझा लेकिन विभेदित जि़म्मेदारियां” से होकर ही निकलता है. दुनिया आज जब भीषण ताप लहरों, असंतुलित मानसून और चरम मौसम की घटनाओं से जूझ रही है, ऐसे समय में भारत का यह स्पष्ट और साहसिक रुख वैश्विक जलवायु वार्ता को नई दिशा देता है. एक विकासशील देश होते हुए भी भारत जिस गति से ऊर्जा संक्रमण, निम्न-कार्बन विकास और प्रकृति आधारित समाधानों की ओर बढ़ रहा है, वह वैश्विक स्तर पर उदाहरण बन चुका है. कोप 30 में पेश किए गए तथ्य यह बताते हैं कि भारत अपने हिस्से के काम को केवल पूरा ही नहीं कर रहा, बल्कि उससे आगे निकल चुका है. भारत की कुल बिजली क्षमता में 50 फीसदी से अधिक हिस्सा अब गैर-जीवाश्म ऊर्जा का है. यह उपलब्धि ऐसे समय में हासिल हुई है जब देश की ऊर्जा मांग लगातार बढ़ रही है. भारत ने कोयले की निर्भरता को सीमित करते हुए नवीकरणीय ऊर्जा को गति दी है और संकेत यह हैं कि देश अपना संशोधित एनडीसी लक्ष्य पांच साल पहले ही हासिल कर सकता है. भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादक है. यह स्थिति खुद बताती है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक साथ चल सकते हैं,यदि नीति स्पष्ट हो और नेतृत्व दृढ़.

2005 से 2020 के बीच भारत ने अपने जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता में 36 फीसदी की गिरावट दर्ज की है. यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि यह प्रमाण है कि भारत की विकासयात्रा अब कार्बन-सघन मॉडल पर आधारित नहीं है. उद्योग, ऊर्जा और परिवहन,सभी क्षेत्रों में सुधारों ने देश को निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ाया है.

यह उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि भारत ने यह प्रगति बिना भारी ऐतिहासिक उत्सर्जन और बिना पर्याप्त वैश्विक वित्तीय सहायता के हासिल की है.

भारत ने 2.29 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक तैयार किया है. वनावरण में लगातार वृद्धि यह दिखाती है कि भारत केवल उत्सर्जन कम करने पर ही नहीं, बल्कि प्रकृति की मरम्मत पर भी गंभीरता से काम कर रहा है. जल, भूमि और वन—इन तीनों को भारत ने जलवायु समाधान का केंद्रीय आधार बनाया है.

भारत का यह कहना बिल्कुल सही है कि जलवायु संकट का पूर्ण बोझ विकासशील देशों पर डालना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक. विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन ने ही मौजूदा संकट की नींव रखी है, इसलिए उनकी जिम्मेदारी भी अधिक है.

भारत की मांग साफ है कि पर्याप्त और पूर्वानुमानित जलवायु वित्त,सस्ती और भरोसेमंद तकनीक सभी देशों को सुलभ होनी चाहिए. दरअसल भारत का संदेश साफ है कि आगे का दशक केवल घोषणाओं का नहीं, बल्कि जमीनी कार्यान्वयन का दशक होना चाहिए. भारत ने अपने घरेलू प्रयासों से दुनिया को रास्ता दिखाया है. अब विकसित देशों की बारी है कि वे अपने वादों को धरातल पर उतारें.

यह सभी को समझना होगा कि जलवायु संकट वैश्विक है, और समाधान भी वैश्विक ही होगा. इस बड़े संघर्ष में भारत की भूमिका,एक स्थिर, न्यायपूर्ण और महत्वाकांक्षी नेतृत्व के रूप में अब और अधिक निर्णायक बन चुकी है.

Next Post

दिल्ली ब्लास्ट…फिदायीन हमले की आशंका

Tue Nov 11 , 2025
नई दिल्ली। दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास कार में हुए जबरदस्त धमाके में मृतकों की संख्या 11 हो गई है। 29 लोग घायल हो गए हैं। घायलों को एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने देर रात घटना स्थल का दौरा किया। […]

You May Like