गाजा की धरती दशकों से रक्त और राख में लिपटी रही है. हर युद्ध, हर संघर्ष के बाद यह प्रश्न और तीखा होता गया कि आखिर शांति का मार्ग किस ओर है. ऐसे समय में, जब मध्यपूर्व फिर से हिंसा की ज्वाला में झुलस रहा था, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से पेश की गई 20-सूत्रीय गाजा शांति योजना न केवल एक कूटनीतिक कदम है, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर संघर्ष से समाधान की दिशा में एक निर्णायक पहल कहा जा सकता है. इस योजना को हमास द्वारा स्वीकार किया जाना और इजरायल द्वारा भी सकारात्मक संकेत देना, लंबे समय बाद एक आशा की किरण लेकर आया है. इस योजना का सबसे अहम पहलू है, “तत्काल युद्धविराम”. युद्ध की निरंतरता ने न केवल हजारों निर्दोषों की जान ली है, बल्कि गाजा को मानो एक मानव त्रासदी का प्रतीक बना दिया था. ट्रंप के दबाव में हमास का युद्धविराम मान लेना, यह संकेत है कि कूटनीति अभी भी बंदूक की आवाज़ से ज़्यादा असरदार हो सकती है.दूसरा महत्वपूर्ण प्रावधान है बंधकों और कैदियों की अदला-बदली. यह मानवीय पहलू दोनों समाजों के बीच विश्वास बहाली की दिशा में पहला कदम है. हमास द्वारा 100 से अधिक बंधकों की रिहाई, जिनमें लगभग 20 जीवित माने जाते हैं, एक भावनात्मक जीत के रूप में देखा जा सकता है. वहीं, इजरायल द्वारा फिलिस्तीनी कैदियों को रिहा करने का निर्णय उसकी व्यवहारिक समझ का संकेत देता है. ट्रंप योजना का तीसरा बिंदु है कि इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी, सबसे संवेदनशील और निर्णायक साबित हो सकता है. यदि यह लागू होता है तो गाजा की जनता को दशकों बाद “स्वशासन” की दिशा में वास्तविक अवसर मिलेगा. हालांकि, इसके साथ जुड़ी सुरक्षा चुनौतियां और स्थायित्व की गारंटी अब भी प्रश्नवाचक हैं.गाजा के अस्थायी प्रशासन के लिए एक अंतरराष्ट्रीय समिति का गठन, जिसमें अरब और इस्लामी देशों की भागीदारी होगी, ट्रंप की “संतुलित मध्यस्थता” की झलक देता है. यह स्पष्ट संदेश है कि अमेरिका अब केवल इजरायल का “अंध समर्थक” नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता का भी संरक्षक बनना चाहता है.मानवीय सहायता के रूप में प्रतिदिन 600 ट्रकों का प्रवेश गाजा की टूटी व्यवस्था में राहत लाएगा. वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल की तैनाती से कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी किसी एक पक्ष पर न रहकर सामूहिक नियंत्रण में होगी.इस योजना का भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्वागत किया है. भारत ने सदैव “संवाद और सहअस्तित्व” की नीति का समर्थन किया है. प्रधानमंत्री मोदी ने इसे “मध्यपूर्व में स्थायी शांति की दिशा में साहसिक और आवश्यक कदम” बताया है. भारत का यह रुख न केवल उसकी संतुलित विदेश नीति को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि नई दिल्ली अब वैश्विक शांति प्रयासों में सक्रिय भागीदारी चाहती है.
फिर भी, यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि ट्रंप की यह योजना स्थायी समाधान बन पाएगी. मध्यपूर्व के इतिहास ने बार-बार दिखाया है कि हर समझौता तभी टिकता है जब दोनों पक्ष अपने जनमत और आक्रोश पर नियंत्रण रख सकें. इजरायल और हमास दोनों के भीतर ऐसे गुट हैं जो किसी भी समझौते को “कमज़ोरी” मानते हैं. इसलिए असली चुनौती अब इस शांति योजना के कार्यान्वयन और निगरानी की है.फिलहाल, गाजा की गलियों में यदि गोलियों की जगह राहत के ट्रक पहुंचें, तो यह दुनिया के लिए राहत की खबर है. ट्रंप की 20-सूत्रीय योजना ने यह साबित किया है कि जब कूटनीति में दृढ़ता और मानवीय संवेदना दोनों का समन्वय होता है, तभी शांति का मार्ग प्रशस्त होता है.
