सतना। सूरज की गति के साथ बदलती माता की भावभंगिमा का रहस्य अब तक कोई नही समझ पाया.
मां काली का एक ऐसा दिव्य दरबार जहां आस्थावानों की मुरादे पूरी होती हैं तो भक्तों की आस्था व चमत्कारों का बड़ा केंद्र है।
मध्य प्रदेश और उत्तरप्रदेश की सीमा पर जिले के अंतिम छोर पर बसे पाथर कछार गांव बाहर घने जंगलों और मनोरम वादियों के बीच मां काली की एक विशाल, भव्य और दिव्य प्रतिमा विराजमान है। यह स्थान न केवल प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है, बल्कि आध्यात्मिक महत्व और चमत्कारिक कथाओं से भी जुड़ा हुआ है। स्थानीय ग्रामीणों और पुजारियों के अनुसार, मां काली की यह प्रतिमा जितनी भव्य दिखती है, उसकी महिमा उससे कहीं अधिक दिव्य है। यहां आने वाले भक्तों की मुरादें जल्दी पूरी होती हैं और यह स्थान मैहर की मां शारदा के बाद जिले में दूसरी सबसे प्रमुख काली माता की अदभुत प्रतिमाव उनकी महिमा के रूप में जाना जाता है। पाथर कछार गांव सतना जिला मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित है और बरौंधा घाटी के नीचे मझगवां बिकासखंड में आता है। जिसके कारण यहां पहुंचना थोड़ा चुनौतीपूर्ण है। फिर भी मां की महिमा ही ऐसी कि चैत्र और शारदेय नवरात्रि के दौरान यहां भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है। लोग मन्नतें मांगते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं, देवी भागवत का पाठ करते हैं और भंडारे का आयोजन करते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि जो भक्त मंदिर तक नहीं पहुंच पाते, वे घर पर ही सुबह-शाम दीपक जलाकर मां की साधना करते हैं, और मां की कृपा उन पर बनी रहती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और ज्वाला सिंह की कथा
मां काली की इस प्रतिमा से जुड़ी एक प्राचीन कथा है, जो कालांतर से चली आ रही है। बताया जाता है कि यह देवी यहां के पूर्व शासक ज्वाला सिंह की इष्ट देवी थी। आज का पाथर कछार गांव पहले पथरीगढ़ स्टेट के नाम से जाना जाता था और ज्वाला सिंह इसके शासक थे। जनश्रुति के अनुसार मां काली की भक्ति से ज्वाला सिंह को विशेष वरदान प्राप्त था। युद्ध के समय स्वयं मां काली उनकी ओर से लड़ती थीं। मां की ऐसी कृपा थी कि ज्वाला सिंह ने आल्हा-उदल जैसे महान योद्धाओं को कई बार परास्त किया था। आल्हा-उदल की कथाएं मध्य भारत की लोककथाओं में प्रसिद्ध हैं, जहां वे अपनी वीरता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन पथरीगढ़ की इस कथा में ज्वाला सिंह की विजय को मां काली की दिव्य शक्ति से जोड़ा जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि यह स्थान आज भी उस प्राचीन शक्ति और आस्था का प्रतीक है, जहां भक्तों की समस्याएं चमत्कारिक रूप से हल होती हैं।
चुनौतियां और विकास की आवश्यकता
हालांकि यह स्थान आध्यात्मिक महत्व से भरपूर है, लेकिन सीमा तय नही होने और सतना मुख्यालय से दूरी और जंगली इलाके के कारण यहां पहुंचने में कठिनाई होती है। नवरात्रि जैसे पर्वों पर तो यहां भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन सामान्य दिनों में लोग कम पहुंच पाते हैं। स्थानीय निवासी और पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यहां सडक़ और परिवहन सुविधाओं का विकास किया जाए, तो यह स्थान एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल बन सकता है। वर्तमान में, गांव की प्राकृतिक सुंदरता और मां काली की प्रतिमा इसे एक छिपा हुआ रत्न बनाती है, जो अधिक ध्यान आकर्षित करने का हकदार है।
