सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पराली जलाने की समस्या पर जो कड़ा रुख अपनाया है, वह केवल न्यायपालिका की चिंता नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक बेचैनी को दर्शाता है. हर साल अक्टूबर-नवंबर में उत्तर भारत की हवा जहरीली हो जाती है और लाखों लोगों के स्वास्थ्य पर संकट मंडराने लगता है. दिल्ली से लेकर पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक धुंध की चादर फैल जाती है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का कहना कि केवल जुर्माना लगाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जेल भेजने जैसे दंडात्मक कदम भी उठाने होंगे, एक कठोर लेकिन गंभीर संदेश है.हालांकि यह भी उतना ही सच है कि पराली जलाना केवल किसानों की ‘जिद’ नहीं है. यह समस्या गहराई में जाकर समझने की मांग करती है. किसान फसल काटने के बाद बहुत सीमित समय में अगली बुवाई की तैयारी करता है. पराली हटाने के लिए उसके पास न मशीनें हैं, न श्रमबल, और न ही पर्याप्त आर्थिक सहायता. ऐसे में आग लगाना उसे सबसे आसान और सस्ता उपाय लगता है. यदि सरकार किसानों को केवल अपराधी मानकर जेल भेजने की नीति अपनाएगी, तो यह न सिर्फ अन्याय होगा, बल्कि कृषि संकट को और गहरा देगा. इसलिए न्यायपालिका का “कैरेट एंड स्टिक” यानी गाजर और छड़ी की नीति का सुझाव संतुलित दृष्टिकोण का मार्ग खोलता है.एक ओर किसानों पर जिम्मेदारी है कि वे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले तरीके न अपनाएं. दूसरी ओर सरकार का भी दायित्व है कि वह उन्हें ऐसे विकल्प उपलब्ध कराए जिनसे पराली का लाभकारी उपयोग हो सके. सुप्रीम कोर्ट ने सही कहा कि पराली को बायोफ्यूल, ईंटें बनाने या अन्य उद्योगों में कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. यदि किसानों को मशीनरी, सब्सिडी और बाजार की गारंटी मिले, तो वे स्वेच्छा से पराली जलाना बंद कर देंगे. आज भी कुछ हिस्सों में हैप्पी सीडर और सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम जैसी मशीनें किसानों को उपलब्ध कराई गई हैं, लेकिन उनका प्रसार सीमित है और लागत अधिक है. देश की अपेक्स कोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों में खाली पदों पर भी चिंता जताई है. यह टिप्पणी बेहद प्रासंगिक है, क्योंकि प्रदूषण पर नियंत्रण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन से होता है. जब निगरानी और प्रवर्तन के जिम्मेदार संस्थान ही कमजोर या निष्क्रिय हों, तो किसानों और उद्योगों से नियम पालन की उम्मीद अधूरी रह जाती है. राज्यों को इस दिशा में तुरंत गंभीर पहल करनी चाहिए.पराली जलाने से निकलने वाला धुआं केवल स्थानीय समस्या नहीं है. यह वातावरण में मिलकर कार्बन उत्सर्जन बढ़ाता है, जलवायु परिवर्तन को तेज करता है और सांस की बीमारियों से लेकर कैंसर तक का खतरा पैदा करता है. दिल्ली और एनसीआर के बच्चों व बुजुर्गों पर इसका प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है. इसलिए इसे केवल ‘कृषि’ या ‘ग्रामीण’ समस्या समझना गलत होगा. यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य और पर्यावरण संकट है.सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से उम्मीद है कि सरकारें अब और टालमटोल नहीं करेंगी. किसानों के लिए प्रोत्साहन योजनाएं और पर्यावरण के लिए सख्त दंडात्मक कदम, दोनों समानांतर चलें तभी समाधान संभव है. किसानों को अपराधी नहीं, बल्कि साझेदार मानकर नीतियां बनानी होंगी. दरअसल,पराली संकट का स्थायी समाधान तभी निकलेगा, जब इसे दंड और प्रोत्साहन दोनों के संतुलन से देखा जाए.बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी एक अवसर है,सरकार और समाज दोनों के लिए कि वे इस चुनौती को मिलकर हल करें. अन्यथा हर साल सर्दियों की धुंध में लाखों लोगों की सांसें घुटती रहेंगी.
