भारत के नए उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन

देश के 15वें उपराष्ट्रपति के चुनाव परिणाम सामने आ चुके हैं. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवार तथा महाराष्ट्र के राज्यपाल रहे सी. पी. राधाकृष्णन ने स्पष्ट बहुमत से जीत दर्ज की है. विपक्ष के उम्मीदवार न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी को 300 मतों पर संतोष करना पड़ा. 98.2 प्रतिशत मतदान और 16 अवैध मतों के बीच यह चुनाव केवल संख्याओं का खेल नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के बदलते समीकरणों का दर्पण भी है.

राधाकृष्णन को कुल 452 मत प्राप्त हुए, जो एनडीए के अधिकृत समर्थन से भी अधिक हैं. इसमें विपक्षी पाले से आए 14 मत निर्णायक सिद्ध हुए. साथ ही, 15 अमान्य मतों ने विपक्ष के गणित को और कमजोर किया. यह परिदृश्य दर्शाता है कि विपक्ष की घोषित एकजुटता व्यवहार में ढीली पड़ गई और सत्ता पक्ष ने अपनी रणनीति से अतिरिक्त लाभ अर्जित कर लिया.इंडिया गठबंधन ने सुदर्शन रेड्डी को उम्मीदवार बनाकर दक्षिण भारत से राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया. रेड्डी ने सांसदों से अंतरात्मा की आवाज़ पर मतदान करने की अपील की थी, किंतु परिणाम ने दिखाया कि विपक्ष अपने ही पाले को एकजुट रखने में असफल रहा. कई दलों का मतदान से दूर रहना और कुछ सांसदों का असहयोग विपक्ष की राजनीतिक कमजोरी को उजागर करता है.

एनडीए ने चुनाव को मात्र औपचारिकता मानने की भूल नहीं की. संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक प्रबंधन के साथ उन्होंने राधाकृष्णन की छवि—स्वच्छ, अनुभवी और सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़ी—को प्रमुखता दी. तमिलनाडु के कोंगु वेल्लालर ओबीसी समुदाय से आने वाले राधाकृष्णन दो बार सांसद रह चुके हैं और उनका चयन सत्ता पक्ष की सामाजिक व राजनीतिक रणनीति का भी हिस्सा रहा.

अब सबसे बड़ी चुनौती राधाकृष्णन के सामने राज्यसभा का संचालन है. उपराष्ट्रपति का पद केवल औपचारिक अधिकार नहीं, बल्कि विचारों के सदन को संतुलित ढंग से चलाने की कसौटी है. हाल के वर्षों में विपक्ष ने बार-बार शिकायत की है कि उसे पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, बहसों को सीमित किया जाता है. नए सभापति से अपेक्षा रहेगी कि वे इन आशंकाओं को दूर करें और सदन को वास्तव में विमर्श का मंच बनाएं. दरअसल,आज का राजनीतिक परिदृश्य ध्रुवीकरण और कटु बहसों से भरा है.

ऐसे में सभापति का निष्पक्ष बने रहना अत्यंत आवश्यक है. सत्ता पक्ष की बहुलता और विपक्ष की मुखरता—दोनों का संतुलन साधना उपराष्ट्रपति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी. यदि राधाकृष्णन सभी दलों को समान अवसर देंगे और सहमति व संवाद की परंपरा को मजबूत करेंगे तो यह न केवल संसद की गरिमा बढ़ाएगा बल्कि लोकतंत्र को भी नई ऊर्जा प्रदान करेगा. कुल मिलाकर उपराष्ट्रपति चुनाव का यह परिणाम सत्ता पक्ष की रणनीतिक सफलता और विपक्ष की कमजोरियों का प्रत्यक्ष संकेत है. किंतु वास्तविक परीक्षा अब प्रारंभ होती है.सी. पी. राधाकृष्णन से देश की अपेक्षा है कि वे केवल सत्तापक्ष के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि पूरे सदन के संरक्षक सिद्ध हों. लोकतंत्र की प्रतिष्ठा इसी में निहित है कि संसद सभी आवाज़ों का मंच बने और राज्यसभा अपने गौरवशाली स्वरूप में कार्य करती रहे. जाहिर है

नए उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती राज्यसभा की निष्पक्षता बनाए रखने, सत्ता और विपक्ष के बीच संवाद का सेतु बनने, ध्रुवीकृत राजनीति में संतुलन साधने तथा संसदीय परंपराओं की गरिमा को पुनर्स्थापित करने की होगी. सदन को विमर्श और सहमति का मंच बनाना उनकी कसौटी है.

 

 

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