रायसेन:उप संचालक कृषि अधिकारी केपी भगत ने किसानों को सुझाव दिए हैं।उनका कहना है कि खड़ी फसल में डीएपी खाद बिल्कुल नहीं डालें।घरों में तैयार कर सकते हैं जीवामृत जिन किसानों की बाजार में उपलब्ध जैविक खाद खरीदने की क्षमता नहीं है।, वह घरों में ही जीवामृत बना कर उपयोग कर सकते हैं ।जिसमें गोबर की खाद, गौमूत्र, बेसन, गुड़, खेत की मिट्टी को पानी के साथ मिला कर फर्मेंट कर 7-10 दिवस बाद तैयार किया जाता है।
इसे बीच-बीच में लकड़ी की सहायता से मिक्स करते रहें। इस जीवामृत को पानी के साथ मिलाकर छिड़काव करना पौधों के लिए अत्यधिक लाभकारी और विभिन्न पोषक तत्वों की कमी की पूर्ति करता है। इससे मिट्टी की उरर्वता बनी रहती है और बीमारियों से भी बचाता है।जबकि खेत की तैयारी एवं खड़ी फसल में डीएपी खाद देने की अनुशंसा नहीं हैं। डीएपी को बीज की बुआई के समय सीड ड्रिल मशीन के माध्यम से बीज के साथ खेत में डाला जाता है।
डीएपी खाद को कभी भी खड़ी फसल में नहीं देना चाहिए। क्योंकि यह एक स्लो रीलिज फर्टिलाइजर हैं और मृदा में चलायमान नहीं है। जिससे यह एक ही जगह पर पड़ा रहता हैं ।अर्थात् पौधों की जड़ों के पास नहीं जा पाता, बल्कि पौधों की जड़ों को इसके संपर्क में आने की जरूरत होती है। इसलिए डीएपी खाद में मौजूद फास्फोरस 46 प्रतिशत खेत की ऊपरी सतह पर ही पड़ा रहता है ।और वह धान की जड़ों को प्राप्त नहीं हो पाता हैं, जिससे किसानों का नुकसान होता है।
क्योंकि यह एक काफी महंगा खाद हैं। नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए यूरिया को चार स्टेज पर बराबर भागों में बांट कर देना चाहिए। बुआई के समय, कल्ले निकलने से पहले, बाली निकलने के पहले एवं बाली आ जाने के बाद दिया जाना चाहिए। नाइट्रोजन देने का यह एक सस्ता 266.50 रुपए प्रति बोरी के माध्यम है। खेत की तैयारी के समय ही किसानों कोएसएसपीएवं नर्सरी की तैयारी के समय डीएपी20:20:0:13 देने की सलाह दी जाती है।
