बानू मुश्ताक ने दशहरा विवाद पर किया पलटवार

हासन (वार्ता) लेखिका और बुकर पुरस्कार विजेता बानू मुश्ताक ने मैसूर दशहरा उत्सव के उद्घाटन के लिए अपने चयन पर सवाल उठाने वाले आलोचकों पर पलटवार करते हुए मंगलवार को सीधी चुनौती दी और कहा कि केवल उन्हीं लोगों को उनकी आलोचना करने का अधिकार है जिन्होंने कन्नड़ में उनके जितना ही योगदान दिया है।

सुश्री बानू ने यहां संवाददाताओं से कहा “कुछ लोग कन्नड़ के साथ मेरे जुड़ाव पर संदेह करने की कोशिश कर रहे हैं। मैं उनसे कहती हूं कि कन्नड़ से उतना ही प्यार करो जितना मैं करती हूं। इसका उतना ही उपयोग करो जितना मैं करती हूं। इसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाओ जितना मैंने किया है। मैं विदेशियों को कन्नड़ ग्रंथ पढ़वाती हूँ, और वे इसे देखकर आश्चर्यचकित होते हैं। यदि आप ऐसा कर पाते हैं, तो आपको मेरी आलोचना करने का अधिकार है। अन्यथा आपके शब्दों में कोई स्पष्टता नहीं है। कन्नड़ उन लोगों को कभी नहीं छोड़ेगा जो उस पर भरोसा करते हैं। मैं इसकी जीती जागती सबूत हूं।” उन्होंने कहा कि उन्हें करोड़ों कन्नड़ लोगों का प्यार एवं स्नेह मिला है और उन्हें एक या दो नकारात्मक आवाजों का जवाब देने की जरुरत नहीं है तथा जनता खुद ऐसी आलोचनाओं का जवाब देगी।

राजनीतिक आलोचकों पर निशाना साधते हुए सुश्री बानू ने कहा, “लोकतंत्र को सत्ताधारी और विपक्षी दोनों दलों की जरुरूरत है, लेकिन सक्रिय राजनेताओं को पता होना चाहिए कि किन मुद्दों का राजनीतिकरण करना है और किनका नहीं।” उन्होंने मैसूर के सांसद यदुवीर वाडियार की प्रशंसा की और कहा कि भाजपा को उनके जैसे और नेताओं को आगे लाना चाहिए जो संतुलित एवं सुसंस्कृत बयान दे सकें।

अपने बुकर पुरस्कार की आलोचना पर उन्होंने जवाबी हमला करते हुए कहा, “बुकर पुरस्कार जीतना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। फिर भी कुछ लोग इसे कम आंकते हैं। उन्हें अपने स्तर के अनुसार बोलने दें। मैं इससे विचलित नहीं हूं।”

पिछले विवादों पर स्पष्टीकरण देते हुए उन्होंने कहा , “वर्ष 2023 के जन साहित्य सम्मेलन पर उनकी टिप्पणी को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया था। वह सम्मेलन हावेरी साहित्य सम्मेलन से मुस्लिम लेखकों को बाहर रखे जाने के विरोध में आयोजित किया गया था। इसकी अध्यक्ष के रूप में मैंने कन्नड़ साहित्य में अल्पसंख्यकों, दलितों और महिलाओं का बचाव किया। मेरे शब्दों का उद्देश्य विश्वास जगाना था – दूरी नहीं।”

गोकक आंदोलन के दौरान अपने योगदान को याद करते हुए सुश्री बानू ने कहा कि हासन में एक बड़े कार्यक्रम में बोलने वाली वह अकेली महिला थीं, क्योंकि वह अपनी तीन बेटियों को कन्नड़ स्कूलों में भेज रही थीं। उन्होंने कहा, “उस समय मैंने अकेले ही बात की थी और मेरे शब्दों को अच्छी भावना से समझा जाना चाहिए, तोड़-मरोड़कर नहीं।”

 

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