आस्था की भीड़ के बीच व्यवस्था का पतन

सीहोर जिले के कुबेरेश्वर धाम में हाल ही में जो भगदड़ हुई, उसने एक बार फिर हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम एक सभ्य समाज के रूप में जनसुरक्षा को लेकर अब भी गंभीर नहीं हो पाए हैं ? इस त्रासदी में सात लोगों की असमय मौत हुई. यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं थी, यह एक मानवजनित विफलता थी, जिसे रोका जा सकता था, टाला जा सकता था, यदि नियोजन होता, समन्वय होता और संवेदनशीलता होती. कावड़ यात्रा के

इस आयोजन में लाखों श्रद्धालु उमड़े. उनमें से अनेक बिना पंजीकरण के आए. यह स्पष्ट करता है कि आयोजकों और स्थानीय प्रशासन के बीच न तो किसी प्रकार की पूर्व तैयारी थी, और न ही आपसी समन्वय का कोई ढांचा. जब लाखों लोगों के एकत्र होने की सूचना पहले से हो, तो क्या यह प्रशासन का कर्तव्य नहीं बनता कि वह सुरक्षा व्यवस्था, आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं, जलापूर्ति, और ट्रैफिक नियंत्रण की प्रभावी योजना बनाए ? दुर्भाग्य से ऐसा कुछ नहीं हुआ.इस घटना ने हमें यह सोचने पर विवश किया है कि क्या धार्मिक आयोजनों की सफलता केवल भीड़ जुटाने से तय होती है ? क्या हमारे धार्मिक केंद्रों में “आस्था” का अर्थ व्यवस्था से विमुख होना है ? और क्या हमारी प्रशासनिक प्रणाली तब तक निष्क्रिय रहती है जब तक किसी आयोजन की भयावह परिणति सामने न आ जाए ?

यह त्रासदी केवल भीड़ की वजह से नहीं हुई, बल्कि आयोजना की कमी, जि़म्मेदारी के अभाव और अव्यवस्था के सामूहिक गठजोड़ से हुई है.7 मौतें यह भी दर्शाती हैं कि आयोजन स्थल पर न तो प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध थी और न ही जल वितरण की समुचित व्यवस्था. क्या यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं है?

राज्य सरकार द्वारा आर्थिक सहायता और जांच की घोषणा ज़रूर एक प्रारंभिक $कदम है, लेकिन यह घटना किसी भी तरह से “साधारण भूल” नहीं कही जा सकती. यह एक सिस्टम की असफलता है, जिसके दोषियों को केवल जांच तक सीमित न रखते हुए, सख्त कार्रवाई के दायरे में लाना होगा. केवल आयोजन रोकना, या पंडाल हटाना ही समाधान नहीं है. यह आवश्यक है कि ऐसे आयोजनों के लिए एक स्थाई प्रोटोकॉल बनाया जाए, जिसमें रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया, ऑनलाइन सूचना प्रणाली, मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर, भीड़ नियंत्रण की तकनीक और प्रशिक्षित वालंटियर्स की टीम की पूर्व व्यवस्था हो. केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे देशभर के धार्मिक आयोजनों के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करें, जो किसी भी आयोजन को धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सुरक्षा के ढांचे में बांध सके. इससे आयोजनों की गरिमा भी बनी रहेगी और जनजीवन भी सुरक्षित रहेगा. इसके अलावा इंदौर भोपाल जैसे व्यस्त मार्ग पर जिस तरह से घंटो जाम लगा रहता है वह भी चिंता का विषय है.इस संबंध में आयोजकों के साथ ही पुलिस और प्रशासन के भी अपने दायित्व हैं जिनका निर्वहन योजनाबद्ध तरीके से होना चाहिए. कुबेरेश्वर धाम की यह घटना पहली बार नहीं हुई. जाहिर है आयोजकों और प्रशासन ने पिछली घटनाओं से सबक नहीं लिया था, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है.बहरहाल, कुबेरेश्वर की यह घटना हमें झकझोरती है, न केवल मृतकों के परिवारों के दर्द से, बल्कि इस सच्चाई से भी कि जब व्यवस्था श्रद्धा के सामने असहाय हो जाती है, तब ईश्वर भी हमें क्षमा नहीं करता.अब वक्त है, सिर्फ श्रद्धा की नहीं, जि़म्मेदारी की भी परिभाषा गढऩे का.

 

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