नई दिल्ली, 05 अगस्त (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने उद्योग और शैक्षणिक भवनों को छूट देने वाली केंद्र सरकार की एक अधिसूचना के एक हिस्से को मंगलवार को रद्द कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने एक स्वयंसेवी संस्था की याचिका पर यह आदेश पारित किया।
पीठ ने केंद्र सरकार की 29 जनवरी, 2025 की अधिसूचना के एक हिस्से को रद्द कर दिया, जिसमें औद्योगिक शेड, स्कूल, कॉलेज और छात्रावासों से संबंधित निर्माण परियोजनाओं को पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के तहत पूर्व पर्यावरणीय मंज़ूरी लेने से छूट दी गई थी।
अदालत ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) की 29 जनवरी की अधिसूचना के खंड 8(ए) के नोट 1 को रद्द कर दिया।
पीठ ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों को भावी पीढ़ियों के लिए ट्रस्ट में रखा जाना चाहिए और विकास को पर्यावरण संरक्षण के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वह उद्योग और शैक्षणिक भवनों को 2006 की अधिसूचना से छूट देने के पीछे का कोई कारण नहीं समझ पा रही है।
अदालत ने कहा कि यदि 20,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र में कोई निर्माण गतिविधि की जाती है तो स्वाभाविक रूप से इसका पर्यावरण पर प्रभाव पड़ेगा।
ईआईए व्यवस्था के तहत, 20,000 वर्ग मीटर या उससे अधिक निर्मित क्षेत्र वाली किसी भी इमारत या निर्माण परियोजना के लिए पूर्व पर्यावरणीय मंज़ूरी आवश्यक थी। विवादित अधिसूचना ने 2006 की ईआईए अधिसूचना की अनुसूची के खंड 8 में संशोधन किया था।
पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायालय ने हमेशा सतत विकास पर ध्यान केंद्रित किया है।
शीर्ष अदालत ने माना कि शैक्षिक उद्देश्यों के लिए छूट मनमाना और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के उद्देश्य के विपरीत है।
