नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति पद को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। सत्तापक्ष की रणनीति का इंतजार कर रहे विपक्षी दलों ने भी अपने स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। कांग्रेस समेत इंडिया गठबंधन के प्रमुख घटकों के बीच यह स्पष्ट संकेत है कि यदि सरकार ने चुनाव में विपक्ष को विश्वास में नहीं लिया, तो यह मौका विपक्ष की एकजुटता का बड़ा मंच बन सकता है।
सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने वरिष्ठ नेताओं के साथ संभावित रणनीति पर चर्चा शुरू कर दी है। पार्टी का मानना है कि विपक्ष के पास उपराष्ट्रपति पद के लिए कई योग्य और प्रभावशाली चेहरे हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अब गेंद सरकार के पाले में है,अगर वह विपक्ष से संवाद नहीं करती है, तो विपक्ष अपनी ताकत दिखाने को तैयार है।
पार्टी सूत्रों ने संकेत दिए हैं कि चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही कांग्रेस विपक्षी दलों की बैठक बुलाकर साझा प्रत्याशी के नाम पर मंथन शुरू करेगी। पिछले उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति चुनाव की तर्ज पर इस बार भी साझा उम्मीदवार उतारने की योजना है, हालांकि इस बार विपक्ष और ज्यादा संगठित दिखना चाहता है।
राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो लोकसभा और राज्यसभा में एनडीए के पास संयुक्त रूप से लगभग 427 सांसद हैं, जबकि इंडिया गठबंधन के पास 310 के आसपास सांसद हैं। हालांकि कुछ सीटें फिलहाल रिक्त हैं, जिससे अंतिम आंकड़ा करीब 776 सांसदों तक सिमटता है। ऐसे में अगर विपक्ष एकजुट होता है, तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
इस बीच, तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी की चुप्पी राजनीतिक संकेतों से खाली नहीं है। ममता बनर्जी इस बार क्या रुख अपनाएंगी, यह तय नहीं है, जबकि एनसीपी प्रमुख शरद पवार फिलहाल महाराष्ट्र की सियासी हलचलों में व्यस्त हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि क्या इन दोनों क्षत्रपों की भूमिका इस बार भी निर्णायक साबित होगी या नहीं।
कुल मिलाकर उपराष्ट्रपति चुनाव एक बार फिर विपक्षी एकता की परीक्षा और सरकार की रणनीतिक समझदारी का मंच बन सकता है।
