इंदौर-देवास मार्ग पर अर्जुन बड़ौद के समीप फ्लाईओवर निर्माण के चलते बीते सप्ताह जो भयावह यातायात संकट देखने को मिला, वह एक स्थानीय समस्या भर नहीं है, बल्कि यह विकास कार्यों की अराजक और असंवेदनशील प्रशासनिक कार्यप्रणाली का एक प्रतीक है. गुरुवार दोपहर से शुरू हुआ यह जाम शुक्रवार देर रात तक जारी रहा, और इस दौरान दो निर्दोष नागरिकों की मौत ने व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया.
62 वर्षीय कमल पांचाल और 32 वर्षीय संदीप पटेल की दुखद मृत्यु एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सिस्टम जनित त्रासदी है. जहां एक व्यक्ति को घबराहट और दम घुटने से जान गंवानी पड़ी, वहीं दूसरे को हार्ट अटैक आया और जाम में फंसने के कारण समय पर अस्पताल नहीं पहुंच सके. यह मौतें केवल दो परिवारों की नहीं, बल्कि एक समाज के उस भरोसे की मौत है जो उसने व्यवस्था पर किया था.
इंदौर-देवास मार्ग पर जो कुछ हुआ, वैसा ही संकट प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी विकराल रूप में उभर रहा है. भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर, सागर, रीवा जैसे शहरों में चल रहे अधूरे स्मार्ट सिटी और पुल निर्माण कार्यों के कारण लोगों को रोजाना घंटों ट्रैफिक में फंसना पड़ता है. वर्षा से पूर्व सडक़ों की मरम्मत न होना, अचानक शुरू होने वाले निर्माण कार्य, और पूर्व सूचना के अभाव में जनता को भारी असुविधा झेलनी पड़ती है.
क्या प्रदेश के विकास कार्यों की योजना ऐसी होनी चाहिए जो नागरिकों की जान पर बन आए? सवाल उठता है कि जब अरबों रुपये की परियोजनाएं बनाई जाती हैं, तब ‘ट्रैफिक डायवर्जन प्लान’ और ‘आपातकालीन चिकित्सा मार्ग’ जैसी मूलभूत व्यवस्थाएं क्यों नहीं सुनिश्चित की जातीं ? सबसे चिंताजनक बात यह रही कि प्रशासन ने इस गंभीर समस्या को तब गंभीरता से लिया जब दो लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से मृत्यु हो गई. आखिर हमारा प्रशासनिक तंत्र निर्दोष लोगों की मृत्यु के बाद ही क्यों जागृत होता है. सवाल यह है कि क्या जनता की पीड़ा तब तक महत्व नहीं रखती जब तक वह राष्ट्रीय सुर्खियों में न आ जाए ?
यदि विकास का मतलब केवल सडक़ों और फ्लाईओवरों का निर्माण है, लेकिन बिना योजना, बिना सुरक्षा और बिना संवेदनशीलता के, तो यह विकास नहीं, ‘विकासजनित संकट’ है. नागरिक सुविधाओं को प्राथमिकता दिए बिना की गई निर्माण गतिविधियां केवल असंतुलित शहरीकरण को जन्म देती हैं, जो आने वाले वर्षों में और अधिक भयावह हो सकती हैं.
अब समय है कि सरकार और प्रशासन पूरे प्रदेश में चल रहे निर्माण कार्यों की समग्र समीक्षा करे. कुछ आवश्यक कदम,निर्माण से पहले ट्रैफिक डायवर्जन की पूर्व योजना अनिवार्य हो.आपातकालीन मेडिकल रूट और एंबुलेंस को सुरक्षित मार्ग देने की व्यवस्था हो.सार्वजनिक सूचना प्रणाली सोशल मडिया, एफएम रेडियो, टेलीविजन एलईडी संकेतकों के द्वारा आम नागरिकों सूचित किया जा सकता है.स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही तय हो, और लापरवाही पर दंड सुनिश्चित हो.
विकास वह नहीं, जो नागरिक को कुचल कर निकले, बल्कि वह होता है जो नागरिक के जीवन को सरल बनाए.यदि इस घटना से भी प्रशासन नहीं जागता, तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और अनुचित होगा !
