सिमडेगा, खुंटी और गुमला में महिला हॉकी का बढ़ता दबदबा; पुरुष हॉकी में गिरावट चिंता का विषय, बुनियादी ढांचे और प्रोत्साहन की कमी बनी चुनौती।
रांची, 24 जून (नवभारत): झारखंड, जिसे कभी हॉकी की नर्सरी कहा जाता था, वहाँ अब इस खेल का चेहरा बदल रहा है। राज्य में महिला हॉकी ने शानदार उड़ान भरी है, खासकर सिमडेगा, खुंटी और गुमला जैसे आदिवासी बहुल जिलों से लगातार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी निकल रही हैं। हालांकि, इसी के समानांतर पुरुष हॉकी में खिलाड़ियों की कमी एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है, जिससे राज्य में खेल के समग्र विकास पर सवाल उठ रहे हैं।
झारखंड की बेटियां हॉकी में अपनी पहचान बना रही हैं। कई युवा महिला खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय चैंपियनशिप में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है और कुछ ने तो भारतीय टीम में भी जगह बनाई है। उनकी सफलता का श्रेय स्थानीय स्तर पर मिल रहे थोड़े बेहतर कोचिंग और सुविधाओं को दिया जा सकता है, साथ ही उनमें खेल के प्रति जुनून और समर्पण भी अहम है। महिला हॉकी टीमों को अक्सर बेहतर प्रशिक्षण शिविर और एक्सपोजर मिल रहा है, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा है।
पुरुष हॉकी में गिरावट के कारण: बुनियादी ढांचे और प्रोत्साहन का अभाव
दूसरी ओर, राज्य में पुरुष हॉकी का प्रदर्शन लगातार गिर रहा है। एक समय था जब झारखंड के पुरुष खिलाड़ी भी राष्ट्रीय हॉकी में अपना दबदला रखते थे, लेकिन अब नई प्रतिभाओं की कमी खल रही है। इसके कई कारण बताए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पुरुष खिलाड़ियों के लिए बुनियादी ढांचा, बेहतर कोचिंग और वित्तीय प्रोत्साहन का अभाव एक बड़ी चुनौती है।
युवा पुरुष खिलाड़ियों को अब हॉकी की जगह क्रिकेट या फुटबॉल जैसे अन्य खेलों में अधिक करियर के अवसर दिख रहे हैं, जिससे वे हॉकी से विमुख हो रहे हैं। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर पर्याप्त टूर्नामेंटों और एक्सपोजर की कमी भी पुरुष हॉकी के विकास में बाधा बन रही है। अगर इस स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया, तो झारखंड से पुरुष हॉकी प्रतिभाओं का निकलना और भी कम हो सकता है, जो इस खेल के लिए राज्य के समृद्ध इतिहास के लिए एक दुखद बात होगी। सरकार और खेल संघों को महिला हॉकी की सफलता से प्रेरणा लेकर पुरुष हॉकी को भी पुनर्जीवित करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

