
जबलपुर। हाईकोर्ट द्वारा मांगी गई जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं किये जाने के कारण दो साल तक दो वेतन वृद्धि रोके जाने की सजा को चुनौती देते हुए याचिका दायर की गयी थी। हाईकोर्ट के कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा तथा जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने लापरवाही के कारण सजा से दंडित किये जाने को उचित करार करते हुए कोर्ट क्लर्क की याचिका को खारिज कर दिया है।
याचिकाकर्ता नंद किशोर चौधरी की तरफ से दायर की गयी याचिका में कहा गया था कि वह देवसर जिला सिंगरौली न्यायालय में कार्यवाहक लिपिक के पद पर पदस्थ था। उसे 22 जून 2016 को आदेश पत्र प्राप्त हुआ। जिसके अनुसार उससे 1 अप्रैल से 30 जून 2016 की अवधि के दौरान महिलाओं, बच्चों, विकलांगों और समाज के कमजोर वर्गों के लोगों से संबंधित मामलों की त्रैमासिक रिपोर्ट मांगी गई थी। उसने आदेश का परिपालन करते हुए 2 जुलाई 2016 को रिपोर्ट जिला न्यायाधीश सिंगरौली के कार्यालय में भिजवा दी थी।
इसके बाद 5 जून 2016 को आदेष प्राप्त हुआ कि रिपोर्ट बी फॉर्म प्रारूप में प्रस्तुत करें। बी फॉर्म प्रारूप के संबंध में उसे जानकारी नहीं थी। जिसके कारण उसने साथियों के सहयोग से 6 जून को बी फॉर्म प्रारूप में रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके बाद उस पर आरोप लगाया गया कि हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में उसकी लापरवाही के कारण समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की जा सकी। जिसके बाद उसे आरोपी पत्र जारी करते हुए विभागीय जांच प्रारंभ कर दी गयी। मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के नियम 23 के तहत दो वेतन वृद्धि की सजा से दंडित किया गया था। अपील करने पर हाईकोर्ट ने उसकी दो वेतन वृद्धि रोके जाने की सजा को दो साल तक कर दिया था। जिसके खिलाफ उक्त याचिका दायर की गयी है।
युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि जांच में याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप सिद्ध पाये गये है। कदाचार के निष्कर्षों से दो वेतन वृद्धि रोकने का दण्ड न्यायोचित है। युगलपीठ ने उक्त आदेश के साथ याचिका को खारिज कर दिया।
