
जबलपुर। भोपाल जिला न्यायालय ने एक साल एक माह की बच्ची के साथ दुराचार करने के मामले में आरोपी पिता को पिता को आजीवन कारावास की सजा से दंडित किया था। जिसके खिलाफ दायर की गयी अपील की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल तथा जस्टिस देव नारायण मिश्रा ने युगलपीठ ने पिता की सजा को निरस्त कर दिया है। युगलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि पास्को एक्ट की धारा 29 तथा 30 के तहत सबूत का बोझ आरोपी पर स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है।
अभियोजन के अनुसार गांधी नगर भोपाल निवासी महिला ने रिपोर्ट दर्ज करवाई थी कि वह बाथरूम गयी थी और वापस आकर देखा कि उसका पति 1 साल 1 माह की बेटी से ऊँगली से गलत हरकत कर रहा था। वह दूसरे दिन बच्ची को लेकर डॉक्टर के पास गयी थी। डॉक्टर ने जांच में पाया था कि बच्ची के गुप्तांग में कुछ लालिमा है। महिला ने जानकारी डॉक्टर को दी थी। जिसके बाद उन्होने महिला को चाइल्ड हेल्पलाइन से मदद लेने की सलाह दी थी।
जिसके बाद पीडित की मॉ ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। मेडिकल जांच में लेबिया मेजोरा, पेरिनियल क्षेत्र और कमर क्षेत्र पर सतही घर्षण के निशान थे। मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार पीड़िता को लगी चोटें पेपर नैपकिन या डिपर के इस्तेमाल से नहीं हो सकतीं। अपीलकर्ता की अंगुली व नाखून के सैंपल लेकर एफएसएल जांच के लिए भेजे गये थे, जो बच्ची के सेम्पल से नहीं मिलते थे।
युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि पोक्सो की धारा 29 और 30 (2) से अभियोजन पक्ष को साक्ष्य अधिनियम की धारा 101 और 102 के तहत सबूत के बोझ से पूरी तरह से राहत नहीं मिलती है। केवल अभियुक्त पर भार डालकर अभियोजन पक्ष का बोझ कम हो जाता है। अभियुक्त पर आरोपों के हटाने का दायित्व तभी होगा,जब अभियोजन पक्ष सबूत के मानक का पालन करके आरोप स्थापित करने में सफल हो जाता है।
युगलपीठ ने अपने आदेष में कहा है कि प्रकरण में अन्य साक्षियों ने अपने बयान में कहा है कि शिकायतकर्ता ने उन्हें घटना के संबंध में बताया था। शिकायतकर्ता पत्नी के द्वारा दर्ज किये गये धारा 161 तथा 164 के बयान तथा न्यायालय में दर्ज कराये गये बयान में विरोधाभासी है।
अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा है कि केवल अपीलकर्ता पिता ने पीड़िता की योनि में उंगली डाली है। अपीलकर्ता संदेह के लाभ पाने का हकदार है और ट्रायल कोर्ट की सजा को रद्द किया जाता है।
