अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती कन्हान नदी

पर्यावरण विशेष

पुरूषोत्तम पोतरे

छिंदवाड़ा/सौंसर – सौंसर क्षेत्र की एकमात्र जीवनदायिनी कन्हान नदी इन दिनों अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है. बेतरतीब उत्खनन और कटाव को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नही उठाने से नदी का स्वरूप बदलते जा रहा है, जिसके कारण जल स्त्रोत काफी निचे खिसक गया है. साथ ही गर्मी के सीजन मे कलकल बहने वाली नदी का धाराप्रवाह भी सीमटकर रह गया है. जबकि बारीश के सीजन में तटीय क्षेत्र से लगे किसानों के खेतों में पानी भर जाता है.

प्रदेश सरकार नदी के अलग अलग क्षेत्र में रेत की खदाने निलाम कर करोडों का राजस्व तो प्राप्त कर लेती है. लेकीन नदी के बचाव को लेकर कोई उचित प्रयास नही करती .कन्हान नदी का क्षेत्र सौंसर के बारादेवी से महाराष्ट की सीमा से लगे ग्राम मालेगांव तक है. इसी क्षेत्र से घोषित खदानों से शराब के बाद सबसे बड़ी आय सरकार को मिलती है. यहां से निकलने वाली रेत अच्छे क्वालीटी की मानी जाती है. फलस्वरूप महाराष्ट्र के पूरें विदर्भ में सप्लाई की जाती है.
पर्यावरण के सरंक्षण को लेकर नही उठाया जाता कोई ठोस कदम
सरकार नदी से करोडों रूपयों का राजस्व तो प्राप्त कर लेती है लेकिन दिनोंदिन असंतुलित हो रहे पर्यावरण को बचाने के लिए उसके द्वारा कोई ठोस कदम नही उठाया जाता है. जिसके कारण नदी में कटाव बढते जा रहे है. जलस्तर के खिसकने का खामियाजा लोगो के अलावा किसानों को और औद्योगिक क्षेत्र को भुगतना पडता है. बोरगांव खैरीतायगांव मे स्थित ग्रोथ सेंटर कन्हान नदी के पानी पर ही निर्भर है. यही नही मध्यभारत के सबसे बडे शहर नागपुर को भी कन्हान नदी से पेयजल की आपूर्ति की जाती है. जिसके लिए महाराष्ट्र की सीमा से कोच्छी बांध का निर्माण वहां की सरकार ने किया है.

बहरहाल कन्हान नदी अपने अस्तीत्व को बचाने के लिए वर्तमान मे संघर्ष कर रही है. अत्याधिक उत्खनन और बढते कटाव के कारण बिगड़ रहे पर्यावरण को संतुलीत बनाए रखने के लिए सरकारी प्रयासों के अलावा सामाजिक संगठनों द्वारा किया जानेवाला शोर शराबा महज खानापूर्ति तक सिमटकर रह गया है.
इनका कहना है 
क्षेत्रीय नदियों के साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रदेश सरकार ने उचित कदम उठाना चाहिए.इससे असंतुलित हो रहे पर्यावरण को रोकने में मदद मिलेगी.जिससे की नदियों के अस्तित्व को बचाया जा सके.
अरुण ठाकरे.
पर्यावरण प्रेमी,वृक्ष मित्र सौंसर

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