वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक लोकसभा के बाद गुरुवार को राज्यसभा में भी पारित हो गया. जाहिर है राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह बिल कानून बन जाएगा.वक्फ बिल का विरोध करने वाले सांसद, राजनीतिक दल और सामाजिक, धार्मिक संगठन यह बताने में विफल रहे हैं कि इस बिल का संशोधन गैर संवैधानिक और किसी धर्म विशेष के अधिकार में हस्तक्षेप क्यों और कैसे है ? वक्फ बोर्ड कानून में अनेक बार संशोधन हो चुके हैं. कोई भी संशोधन संसद की मंजूरी के बाद ही कानून का रूप लेता है.ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि मौजूदा सरकार संशोधन करके संविधान विरोधी काम कर रही है ? जहां तक धार्मिक हस्तक्षेप का प्रश्न है तो दुनिया के 57 मुस्लिम देशों में से 53 मुस्लिम देशों में वक्फ बोर्ड जैसी कोई संस्था नहीं है. यह संस्था केवल भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में ही है, जहां मुगल सल्तनत थी और जहां अंग्रेजों ने राज किया. दरअसल, 12 वीं सदी में दिल्ली सल्तनत के समय वक्फ मजलिस की सबसे पहले स्थापना हुई. इसे 1935 में अंग्रेजों ने संस्थागत कानूनी रूप दिया.हमारी संविधान सभा ने 1935 के ब्रिटिश एक्ट के इस वक्फ कानून को खारिज कर दिया. यानी हमारे मूल संविधान में वक्फ कानून था ही नहीं .आजादी के बाद 1954 में पहली बार वक्फ एक्ट बना और फिर साल 1995 में इस एक्ट में कुछ संशोधन किए गए. डॉ मनमोहन सिंह के समय फिर नया वक्फ एक्ट बना और इसमें साल 2013 में भी कई बदलाव किए गए.यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि यूपीए सरकार के समय 2006 की जस्टिस सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर ही गुरुवार को पारित एक्ट में अधिकांश बदलाव किए गए हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ बोर्ड को धार्मिक संस्था नहीं बल्कि धार्मिक संपत्ति का प्रबंध करने वाली संस्था माना है. बहरहाल,नए बिल के कानून बन जाने के बाद वक्फ की संपत्ति का विवाद सुलझाने में अब राज्य सरकारों को पहले से अधिक शक्तियां हासिल होंगी.हालांकि प्रस्तावित कानून का असर पुरानी मस्जिदों, दरगाहों या मुसलमानों के धार्मिक संस्थानों पर नहीं पड़ेगा. दरअसल, 2013 के वक्फ एक्ट में कई विसंगतियां थी. उसमें प्रावधान था कि वक्फ संपत्तियों के विवाद केवल वक्फ ट्रिब्यूनल में ही सुलझाए जा सकते हैं. ट्रिब्यूनल के फैसले को अंतिम माना जाएगा. इसे सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती नहीं दी जा सकती. यही वह प्रावधान था जिसका लंबे समय से दुरुपयोग हो रहा था. स्थिति यह थी कि भारतीय संसद भवन, ताज महल और कोलकाता एयरपोर्ट को भी वक्फ की संपत्ति घोषित कर दिया गया था.जाहिर है कोई भी संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य इस तरह की विसंगतियों को लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता था. इसलिए इसमें बदलाव किए गए हैं. प्रधानमंत्री मोदी की सरकार द्वारा 2023 में प्रस्तुत विधेयक को जेपीसी में 6 महीने तक विचार के लिए रखा गया. इस दौरान देश भर के सभी मुस्लिम संगठनों ने अपनी राय दी है. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि इस विधेयक को जल्दबाजी में लाया गया. संसद में पारित प्रत्येक कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है. जाहिर है विरोध करने वाले सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए स्वतंत्र हैं. बहरहाल, अब जब यह बिल कानून बनने जा रहा है तो सभी राजनीतिक दलों, सभी पक्षों के धार्मिक नेताओं और सामाजिक संगठनों को चाहिए कि भडक़ाऊ बयान बाजी बंद करे. देश के लिए यही अच्छा है कि विधायिका और न्यायपालिका को अपना काम करने दिया जाए.
