
मालवा- निमाड़ की डायरी
संजय व्यास
भाजपा के बाद अब कांग्रेस भी संगठन में बड़े बदलाव के मूड में दिख रही है. महू रैली में राहुल गांधी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भरोसा दिलाया था किवे यहां कांग्रेस को पुन: सशक्त कर खड़ा करने में जी-जान लगा देंगे, वे इस समय लोकसभा चुनाव में करारी हार के लिए माफी मांग रहे थे. अब सशक्तिकरण की दिशा में बढऩे के लिए सक्रिय नए जिलाध्यक्षों की नियुक्तियों की तैयारी कांग्रेस कर रही है. संगठन की मजबूती की बात कर रहे जीतू पटवारी के लिए यह अखरने वाली बात है कि अंचल में रतलाम और खंडवा जिले ऐसे हैं जहां फिलहाल जिलाध्यक्ष ही नहीं है. कांग्रेस के कार्यक्रम कार्यकर्ताओं के भरोसे नेतृत्व के बिना किस तरह विफल होते हैं सब जानते हैं. इंदौर में भी जिलाध्यक्ष डावांडोल ही रहा. लोकसभा चुनाव के पूर्व कैलाश पटेल के भाजपा में शामिल हो जाने के बाद से रतलाम जिलाध्यक्ष का पद खाली है, जबकि करीब पखवाड़े पूर्व प्रदेश कांग्रेस प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह खंडवा जिला कार्यकारिणी भंग कर चुके. संगठन में बदलाव व नए जिलाध्यक्ष की नियुक्तियां भंवर और पटवारी की आपसी खींचतान के कारण तभी से अटकी हुई हैं. अब देखते हैं नए प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी और पटवारी की पटरी कैसी बैठती है. इनकी जुगलबंदी में शीघ्र निर्णय लिए जाते हैं या उन्हें पहले की तरह लंबा खींचा जाता है. अगर फटाफट फैसले लिए जाएंगे तभी पटवारी सक्रिय संगठन के साथ राहुल गांधी से किए वादे की दिशा में आगे बढ़ पाएंगे.
खंडवा में चयन एक चुनौती
खंडवा कांग्रेस में शहर और जिलाध्यक्ष दोनों पदों पर खंडवा नगर से ही ब्राह्मण की नियुक्ति के बाद से ही जिले की आबादी में 52 प्रतिशत हिस्सा रखने वाले पिछड़ा वर्ग व ग्रामीण क्षेत्र के नेताओं ने इसके विरोध में मोर्चा खोल रखा था, जो जिला कार्यकारिणी भंग होने के साथ शांत हुआ. सियासी गलियारों में नई नियुक्तियों की चर्चा चलते ही दावेदार मैदान में आ गए हैं. कांग्रेस को इनके चुनाव पसीना छूटने वाला है. दरअसल कांग्रेस को पीछे धकेलने में खंंंडवा जिला सबसे बदनसीब माना जाता है. शिवकुमारसिंह के बाद डा. मुनीष मिश्रा और अजय ओझा जैसे लोगों को भी संगठन या कहें,यहां के नेता पचा नहीं पाए. अब नए शहर व ग्रामीण जिलाध्यक्षों की खोजबीन शुरू हो गई है. इसके लिए ऐसे नाम चर्चाओं में हैं, जो दस-पच्चीस समर्थकों को भी फोन पर गांधी भवन नहीं बुला सकते. गुटबाजी यहां पार्टी का गला घोंट रही है. जिले में कांग्रेस के ग्रामीण एवं शहर अध्यक्ष को लेकर कई नाम चल रहे हैं. जो दावेदार हैं, उन्होंने भोपाल से लेकर दिल्ली तक संपर्क साधने शुरू कर दिए हैं. कांग्रेस में विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए दमदार शहर एवं ग्रामीण अध्यक्ष का चयन एक चुनौती है . मुद्दे काफी हैं, लेकिन इन्हें उठाने के बजाए अधिकतर नेता अपनी पार्टी के पदाधिकारियों को ही उखाडऩे में अपनी ताकत और समय गंवा देते हैं.
किसानों की नजर शासन के एक्शन पर
फसल पकने को तैयार है, पर इन दिनों किसान नीलगाय से परेशान हैं. झुंड में पहुंचती नीलगायें खेतों में फसल रौंद डालती हैं. यह समस्या बड़वानी, मंदसौर, उज्जैन जिले में हर साल की है. उज्जैन क्षेत्र में किसान महिने भर से दिनरात फसल की सुरक्षा को लेकर खेतों में डेरा जमाए हुए हैं. रखवाली करने के बाद भी नीलगाय के साथ जंगली सूअर भी खेतों में पहुंचकर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे है. इनके कारण गेहूं व चने की फसल प्रभावित हो रही है. बड़वानी जिले के तो और भी बुरे हाल हैं. क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में लोग गत वर्ष से तेंदुओं के कारण परेशान रहे, वहीं अब नीलगायों के कारण किसान परेशान होते नज़र आ रहे हैं. वन विभाग एवं शासन द्वारा अब तक इस समस्या के निदान के लिए ठोस योजना नहीं बनाई गई है. हालांकि तेंदुओं के बाद अब नीलगायों को पकडऩे के लिए योजनाओं पर चर्चाएं होने लगी है. किसानों को ऐसी योजना के अमल होने का इंतजार है. उनकी नजर शासन के एक्शन पर टिकी है.
फोटो- चौधरी से जुगलबंदी पर निर्भर जीतू का वादा … में जीतू पटवारी
– किसानों की नजर शासन के एक्शन पर … में नीलगाय
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