दिल्ली डायरी
प्रवेश कुमार मिश्र
27 वर्षों के इंतजार के बाद दिल्ली फतह कर चुकी भाजपा अब मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर मंथन कर रही है. दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इस समय नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर कयासबाजी जारी है. कोई पुर्वांचली राजनीति को आगे बढ़ाने में जुटा है तो कोई युवा तुर्क के कंधों पर जिम्मेदारी देने की वकालत कर रहा है. ऐसे में कुछ नेता अरविंद केजरीवाल को पटखनी देने वाले युवा नेता प्रवेश वर्मा तथा सांसद बांसुरी स्वराज को तो कुछ लोग पूर्वांचल से संबंध वाले नेताओं में से किसी को कमान सौंपकर बिहार की राजनीति साधने की बात कह रहा है. इतना ही नहीं कुछ लोग विजेन्द्र गुप्ता व डाक्टर हर्षवर्धन जैसे अनुभवी नेताओं के हाथ जिम्मेदारी देने की बात भी कर रहे हैं. लेकिन इन सबके बीच मुख्यमंत्री का ताज किसके माथे चढ़ेगा इसको लेकर बहुस्तरीय लाबिंग चल रही है. चर्चा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विदेश दौरे से लौटने के बाद ही अन्य राज्यों की तर्ज पर चौंकाने वाले नाम पर निर्णय होगा.
पंजाब की सियासी उठापटक को रोकने में जुटे केजरीवाल
दिल्ली में चुनावी पटखनी के बाद आम आदमी पार्टी को पंजाब में सांगठनिक व राजनैतिक ढांचा चरमराने का डर सताने लगा है. चर्चा है कि पंजाब के भागवत मान सरकार को उनके अपने विधायकों द्वारा ही प्रत्यक्ष चुनौती मिल रही है. इतना ही नहीं विभिन्न माध्यमों से यह खबर भी दिया जा रही है कि आधे ज्यादा आप विधायक दल के खिलाफ मोर्चाबंदी करते हुए भाजपा, अकाली या कांग्रेस से मिलकर सरकार बनाने में जुटे हैं. उक्त संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने पंजाब के विधायकों के साथ व्यक्तिगत बैठक करने की रणनीति बनाई है और वे किसी भी परिस्थिति में दल को एकजुट रखने के प्रयास में लगे हुए हैं.
इंडिया गठबंधन के अस्तित्व को बचाने की कवायद
कांग्रेस के रूख से नाराज इंडिया समूह के घटक दल अब कांग्रेस से अलग अपने अस्तित्व को बचाने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं. चर्चा है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई में इंडिया समूह के कुछ दल जल्द ही बैठकर करेंगे और भविष्य की रणनीति को अमली जामा पहनाने का प्रयास करेंगे. क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने कांग्रेसी रणनीतिकारों पर प्रत्यक्ष आरोप लगाकर दिल्ली व महाराष्ट्र हार के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है. चर्चा है कि कांग्रेस अपने सख्त रुख से क्षेत्रीय दलों को बड़ा संदेश देने में लगी हुई है और इसी वजह से कांग्रेसी नेता दिल्ली हार पर गम के बजाय शांत दिख रहे हैं. दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कुछ क्षेत्रीय क्षत्रप कांग्रेस को इस समूह से अलग करने की वकालत कर रहे हैं लेकिन राजद व झामुमो जैसे दल अभी भी कांग्रेस के साथ रहकर वोटों के बिखराव को रोकने के प्रयास में जुटे हैं.
कांग्रेस ने आप से लिया बदला
कांग्रेस पार्टी को दिल्ली विधानसभा चुनाव में भले ही सफलता हासिल नहीं हुई है लेकिन पार्टी अपने वोटबैंक की बढ़ोत्तरी से खुश है. इतना ही नहीं पार्टी रणनीतिकार मान रहे हैं कि कांग्रेसी जमीन को ही कब्जा कर क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ है ऐसे में कांग्रेस अपने अस्तित्व को समाप्त करके क्षेत्रीय दलों को सत्ता दिलाने में सहायक नहीं होना चाहती है. हालांकि कुछ लोग कह रहे हैं कि कांग्रेसी ने सोची समझी रणनीति के तहत हरियाणा, गोवा व गुजरात विधानसभा में आम आदमी पार्टी द्वारा किए गए प्रत्यक्ष नुकसान का बदला दिल्ली विधानसभा चुनाव में लिया है. चुनाव परिणाम के बाद पार्टी नेता कह भी रहे हैं कि कांग्रेस हमेशा दूसरों के लिए कंधे का सहारा नहीं बनना चाहती है. चर्चा है कि दिल्ली के बहाने कांग्रेस इंडिया गठबंधन के सहयोगियों को यह संदेश भी देना चाहती है कि वह चाहे तो क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व को खतरे में डाल सकती है और चाहे तो बचा भी सकती है. ऐसे में सहयोगी दलों द्वारा उसे वाजिब सम्मान देना होगा.
महाकुंभ में उमड़ी भीड़ की धमक संसद तक
प्रयागराज महाकुंभ में उमड़ी अप्रत्याशित भीड़ के लिए किए जा रहे इंतजाम को लेकर राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार इन दिनों विपक्षी दलों के निशाने पर है. अव्यवस्था को आधार बनाकर संसद के दोनों सदनों में राज्य सरकार को विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा आरोपित किया गया है. हालांकि अनुमान से ज्यादा भीड़ को ही बदइंतजामी का कारण बताया गया है लेकिन विपक्षी दलों के नेता सरकारी दावों व इंतजाम को आधार बनाकर डबल इंजन वाली सरकार से सवाल कर रहे हैं.
