जयशंकर ने अबू धाबी के क्राउन प्रिंस से की मुलाकात की, संबंधों को और मजबूत करने पर की चर्चा

अबू धाबी/ नयी दिल्ली, 28 जनवरी (वार्ता) संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की यात्रा पर गये विदेश मंत्री (डॉ.) एस. जयशंकर ने मंगलवार को अबू धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात की और द्विपक्षीय साझेदारी को और बढ़ाने पर चर्चा की।

डॉ जयशंकर ने रायसीना पश्चिम एशिया के उद्घाटन सत्र को भी संबोधित किया। उन्होंने यूएई के राष्ट्रपति के राजनयिक सलाहकार अनवर गर्गश से भी बातचीत की।

विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट किया, “ अबू धाबी के क्राउन प्रिंस एचएच शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मिलकर खुशी हुई। उनकी हाल ही में भारत की यात्रा को याद किया और भारत-यूएई साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा की। ”

उन्होंने कहा, “ आज सुबह यूएई के राष्ट्रपति के कूटनीतिक सलाहकार अनवर गर्गश से मिलकर अच्छा लगा। हमारी विशेष साझेदारी और इसकी आगे की प्रगति पर चर्चा की। ”

रायसीना मिडिल ईस्ट में अपने संबोधन पर उन्होंने पोस्ट किया, “ अबू धाबी में रायसीना मिडिल ईस्ट के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुये पिछले दशक में भारत-पश्चिम एशिया के बीच संबंधों के महत्वपूर्ण विस्तार पर प्रकाश डाला, जो मजबूत व्यापार, संपर्क और लोगों के बीच संबंधों से प्रेरित है, और कहा कि कैसे दोनों देशों के बीच यह साझेदारी बदलती दुनिया में विशेष महत्व रखती है। ”

विदेश मंत्री ने कहा, “ व्यापक हितों और बढ़ती क्षमताओं वाला भारत पश्चिम एशिया को न केवल एक करीबी साझेदार के रूप में देखता है, बल्कि दुनिया से परे एक महत्वपूर्ण देश के रूप में भी देखता है। ”

राष्ट्रपति के कूटनीतिक सलाहकार गर्गश ने एक्स पर अपना पोस्ट किया, “ मुझे भारत के विदेश मंत्री महामहिम डॉ. जयशंकर के साथ रायसीना पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) सम्मेलन के पहले संस्करण के उद्घाटन में शामिल होने पर बेहद खुशी हुई है। यह सम्मेलन नयी दिल्ली के साथ सकारात्मक सहयोग बढ़ाने और एक नये ज्ञान और संवाद मंच की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो एक दूसरे से जुड़े अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय परिदृश्य में अबू धाबी की स्थिति को मजबूत करता है जिसके लिये गहन समझ और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण की आवश्यकता है। ”

श्री गर्गश ने कहा, “ अपने भाषण में, मैंने यूएई के संप्रभु अभिविन्यास को इसके राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी

आयामों के साथ संबोधित किया, और युद्ध और शांति के निर्णयों में राष्ट्र-राज्य की केंद्रीयता और मानवीय आयाम की प्राथमिकता पर जोर दिया। ”

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