एंडोमेट्रियोसिस के किन प्रमुख लक्षणों के बारे में महिलाओं को पता होना चाहिए और क्लिनिक में जल्द से जल्द निदान कैसे हो सकता है?

डॉ. अंशुमाला शुक्ला-कुलकर्णी, प्रमुख, मिनिमली इन्वेसिव गायनोकोलॉजी, गायनोकोलॉजी लेप्रोस्कोपिक और रोबोटिक सर्जरी, कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल, मुंबई

एंडोमेट्रियोसिस एक लंबे समय तक चलने वाला विकार है। दुनिया भर में 10 से 15 प्रतिशत महिलाएं इससे पीड़ित हैं, फिर भी जागरूकता की कमी और इसके लक्षण बहुत ही सामान्य होने की वजह से अक्सर इसका निदान नहीं हो पाता है। एक टिश्यू जो गर्भाशय की परत की तरह ही होता है, गर्भाशय कैविटी के बाहर बढ़ता है, और यह आमतौर पर अंडाशय, फैलोपियन ट्यूब और पेल्विक लिगामेंट को प्रभावित करता है। असामान्य टिश्यू की वजह से सूजन आती है और टिश्यू चिपक जाता है, निशान पड़ जाते हैं, जिससे दर्द होता है और गर्भवती होने में समस्या जैसे अलग-अलग लक्षण दिखाई देते हैं।

यह स्थिति 25 साल की उम्र में शुरू हो सकती है और लगभग 50 साल की उम्र तक जारी रह सकती है। दुर्भाग्य से, ज़्यादातर महिलाएं इस बीमारी से अनजान रहती हैं। अक्सर, वे अपने दर्द को अनदेखा कर देती हैं, दर्द निवारक दवाओं का सहारा लेती हैं और जब तक उन्हें गर्भधारण करने में कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता, तब तक वे डॉक्टर से सलाह नहीं लेती हैं। कई महिलाओं को प्रजनन क्षमता की जांच के दौरान ही पता चलता है कि उनकी समस्या का सबसे बड़ा कारण एंडोमेट्रियोसिस है।

सबसे आम लक्षण इस प्रकार हैं:

  • क्रोनिक पैल्विक दर्द जो मासिक धर्म के दौरान बढ़ता है।
  • मासिक धर्म की अनियमितता, उन दिनों में बहुत ज़्यादा दर्द होना, भारी रक्तस्राव होना।
  • सेक्स के दौरान दर्द, जिसे अक्सर सामान्य समझ लिया जाता है।
  • शौच या पेशाब करते हुए बहुत ज़्यादा दर्द होना, खास कर मासिक धर्म के दौरान।
  • मासिक धर्म मे थकान, सूजन और मतली
  • एंडोमेट्रियोसिस की वजह से प्रजनन अंगों का नुकसान होता है और गर्भधारण करने में परेशानी होती है।

ये लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं, कभी-कभी बहुत हल्के रह सकते हैं, कुछ महिलाओं में जब तक उन्हें गर्भधारण करने में कठिनाई न हो, तब तक नहीं दिखते। इसलिए, जब तक गर्भधारण करने में परेशानी न हो तब तक महिलाएं अपनी इन समस्याओं के लिए मदद नहीं लेती हैं, इन्हें सामान्य मान लेती हैं। जागरूकता की कमी की वजह से एंडोमेट्रियोसिस का निदान करने में देरी हो जाती है।

एंडोमेट्रियोसिस के लिए इलाज तभी शुरू हो सकता है जब स्थिति का निदान होता है। किसी विशेष सन्दर्भ में उन उन्नत डायग्नोस्टिक निष्कर्षों को उपयोग में लाने वाले विशेषज्ञों की भूमिका को कम आंका नहीं जा सकता है। ट्रांसवेजिनल अल्ट्रासोनोग्राफी, एमआरआई और मिनिमली इन्वेसिव लैप्रोस्कोपिक कुछ ऐसी डायग्नोस्टिक तकनीकें हैं, जिनका उपयोग सबसे सेंटर्स में सटीक निदान और स्टेजिंग को पूरा करने के लिए किया जाता है। रोबोट असिस्टेड सर्जरी जैसी उन्नत सर्जिकल विधियों ने एंडोमेट्रियोसिस सर्जरी के परिणामों में सुधार किया है। यहां तक कि सर्जरी के लिए अक्सर कोलोरेक्टल सर्जन और यूरोलॉजिस्ट की टीम के साथ मल्टी-डिसिप्लिनरी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, डायग्नोस्टिक चरण में लक्षणों की जांच के साथ-साथ पूरी मेडिकल हिस्ट्री भी ली जाती है।

एंडोमेट्रियोसिस पर ध्यान केंद्रित करने वाले क्लीनिकों को मल्टी-डिसिप्लिनरी दृष्टिकोण पर जोर देना चाहिए, जहां गायनेकोलॉजिस्ट्स, रेडियोलॉजिस्ट, पेन स्पेशलिस्ट्स और फर्टिलिटी एक्सपर्ट एक साथ काम करते हैं। इससे मरीज़ों को उनके लक्षणों, बीमारी के चरण और प्रजनन लक्ष्यों के अनुसार अनुकूलित योजनाओं के साथ इलाज मिलता है। उपचार में आम तौर पर दर्द के लिए दवा, बीमारी की प्रगति को धीमा करने वाली हार्मोनल थेरेपी, और गंभीर मामलों में स्कार टिश्यू और एंडोमेट्रियल वृद्धि को हटाने के लिए सर्जरी शामिल हैं।

यूरोप और यूके के सेंटर ऊपर बताए गए समान कारणों की वजह से NICE और यूरोपीय एंडोमेट्रियोसिस लीग (EEL) द्वारा प्रस्तुत मानकीकृत प्रोटोकॉल का पालन करते हैं। भारत में एंडोमेट्रियोसिस के बारे में जागरूकता बढ़ रही है, और कुछ क्लीनिक इलाज के परिणामों को बेहतर बनाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों और शोध को अपना रहे हैं।

लक्षणों की पहचान करने और समय रहते विशेषज्ञों से सलाह और देखभाल पाने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाना एंडोमेट्रियोसिस के प्रभावी प्रबंधन की दिशा में एक कदम होगा। उन्नत निदान और व्यापक देखभाल ढांचे वाले क्लीनिक में समय पर सही इलाज मिलते हैं और जटिलताओं की जोखिम को कम किया जाता है। जागरूक बन कर और विशेषज्ञ देखभाल तक पहुंच में सुधार करके, मेडिकल समुदाय इस स्थिति से पीड़ित महिलाओं के जीवन की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है।

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