सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस सांसद प्रतापगढ़ी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर लगाई रोक

नयी दिल्ली, 21 जनवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने कथित तौर पर सांप्रदायिक विद्वेष को बढ़ावा देने वाली कविता सोशल मीडिया पर डालने के मामले में कांग्रेस सांसद एवं कवि इमरान प्रतापगढ़ी पर कोई दंडात्मक कार्रवाई करने पर मंगलवार को रोक लगा दी।

न्यायमूर्ति ए एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने प्रतापगढ़ी को उनकी याचिका पर यह राहत दी और अदालत ने गुजरात सरकार और अन्य को नोटिस जारी किया।

श्री प्रतापगढ़ी ने अपनी याचिका में अपने खिलाफ दर्ज मुकदमे को रद्द करने से इनकार करने वाले गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी।

शीर्ष अदालत ने निर्देश देते हुए कहा, “हमने कविता भी सुनी… संक्षिप्त नोटिस जारी करें। 10 फरवरी को जवाब देना है। दर्ज मुकदमे के मामले में कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।”

प्रतापगढ़ी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा उनकी प्राथमिकी रद्द करने की याचिका को खारिज करने की आलोचना करते हुए कहा, “हम किस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं? न्यायालय को कुछ कहना है। बिना नोटिस जारी किए (उच्च) न्यायालय ने इसे (खारिज करने का) आदेश दे दिया।”

कांग्रेस सांसद के खिलाफ यह प्राथमिकी एक अधिवक्ता के क्लर्क की शिकायत के आधार पर दर्ज की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि प्रतापगढ़ी ने सोशल मीडिया पर ‘ऐ खून के प्यासे बात सुनो…’ कविता वाला एक वीडियो पोस्ट किया था।

इस मामले में गुजरात पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 197 (राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाने वाले आरोप), 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से किए गए कृत्य) और 302 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से शब्द बोलना) के तहत मुकदमा दर्ज किया था।

गुजरात उच्च न्यायालय ने 17 जनवरी को प्राथमिकी रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि जांच अभी शुरुआती चरण में है।

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति संदीप एन भट ने अपने कहा, “मुझे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 अथवा भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करने का कोई कारण नहीं दिखता।”

उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट पर प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि इससे सामाजिक सद्भाव बिगड़ सकता है।

अदालत ने कहा, “भारत के किसी भी नागरिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसा व्यवहार करे जिससे सांप्रदायिक सद्भाव या सामाजिक सद्भाव बिगड़े नहीं। याचिकाकर्ता से, संसद सदस्य होने के नाते, ऐसी पोस्ट के नतीजों को समझते हुए अधिक जिम्मेदारी से काम करने की अपेक्षा की जाती है।”

उच्च न्यायालय के राहत देने से इनकार के बाद प्रतापगढ़ी ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसने अब कांग्रेस सांसद को अस्थायी राहत प्रदान करते हुए कार्यवाही पर रोक लगा दी है।

शीर्ष अदालत इस मामले में अगली सुनवाई 10 फरवरी को करेगी।

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