स्टेशन से गायब हुआ जनता खाना
जबलपुर: रेल यात्रा कर रहे साधारण यात्रियों को भरपेट भोजन देने के लिए चलाई गई जनता खाना मुहिम अब स्टेशनों से ओझल हो चुकी है। मुसाफिरों को सस्ते दामों पर खाना उपलब्ध हो इसलिए रेलवे द्वारा जनता खाना स्टॉलों पर बेचने के लिए कहा गया था। लेकिन जनता खाना की उपलब्धता इतनी मात्रा में नहीं हो पा रही है, जितनी इसकी डिमाण्ड है। यही कारण है कि साधारण तबके के मुसाफिर एक स्टॉल से दूसरे स्टॉल जनता खाना के लिए परेशान होते हैं। और स्टेशन पर खाना विक्रेताओं की मनमानी इस कदर हावी रहती है कि वह यात्रियों को सस्ता खाना मुहैया नहीं कराते हैं। अफसरों को बताने के लिए चंद थालियां सैंपल के तौर पर सजा लेते हैं।
ऐसी थाली मिलनी चाहिए
नियमो के अनुसार जनता खाने की थाली में सात पूरी जो 175 ग्राम की हो, सब्जी 150 ग्राम, अचार 15 ग्राम और एक हरी मिर्च होना अनिवार्य है। इसके साथ ही थाली के पैकेट पर इसकी कीमत और बनाने का समय भी लिखा होना जरूरी है। इसकी कीमत बीस रुपए तय की गई थी।
नहीं रहता समय
लंबी दूरी की ट्रेनें जैसे हावड़ा मेल, पुणे दानापुर, उधना मालदा टाऊन, मुंबई डिब्रूगढ़ जैसी अन्य गाड़ियों में यात्रा करने वाले मुसाफिरो की ट्रेन जैसे ही प्लेटफॉर्म पर पहुँचती है, वह खाने की तलाश में जुट जाते है। उनकी पहली प्राथमिकता जनता खाना होती है, लेकिन वैध और अवैध वेंडर्स की भीड़ के बीच जनता खाना गायब हो जाता है। यात्री ट्रेन से उतरकर कैंटीनों की तरफ भागना भी चाहे तब तक ट्रेन के चलने का समय हो जाता है और उन्हें न चाहते हुए भी समोसे, आलू बंडे से काम चलाना पड़ता है।
हवा हो गया सिस्टम
रेलवे द्वारा कुछ सालो पहले स्टेशनो में एक नई पहल शुरू की गई थी, जिसके तहत प्लेटफॉर्म पर पहुँचने वाली सभी यात्री गाड़ियों के जनरल कोचों के सामने जनता खाना का स्टॉल लगवाया गया था। जैसे ही ट्रेन आती, वैसे ही इन ट्रेनों के जनरल कोचों के सामने जनता खाना का स्टॉल मौजूद रहता था। साधारण यात्री इसी जनता खाना को खरीदते थे और खा रहे थे, लेकिन यह अभियान महज औपचारिकता तक सीमित रहा और कुछ ही दिनों में हवा हो गया। अब ट्रेने तो आ रही हैं, लेकिन उनके जनरल कोचों के सामने से जनता खाने का स्टॉल गायब है। मुसाफिर महँगी खाद्य सामग्री खरीदने को मजबूर हो रहे हैं। जितने पैसे में जनता खाना मिल जाता है, उतने में अन्य सामग्री भी नहीं आ रही है।
इनका कहना है
जनता खाना चालू है अगर मुहिम सही ढंग से नहीं चलाई जा रही है तो इसे मैं दिखवा देता हूं।
हर्षित श्रीवास्तव, सीपीआरओ, पश्चिम मध्य रेल
