
केमिकल से रिसाइकिल करके बेच रहे थे 40 से 50 रुपए किलो में
मामला : नष्ट कराए 30 क्विंटल गुड़ का
(संजय जैन) सुसनेर, 6 जनवरी. सादे कागज पर बनाए बिलों से करोड़ों का टर्न ओवर करने वाले एक व्यापारी के निजी गोदाम से 28 दिसंबर को खाद्य विभाग ने 30 क्विंटल रिसाइकिल गुड़ जब्त कर नष्ट कराया था. उस मामले में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. निजी व्यापारी यह घटिया व खराब गुड़ राजगढ़ जिले के जीरापुर और पचोर के दो कोल्ड स्टोरेज से खरीदकर लाया था.
सूत्रों के हवाले से उक्त व्यापारी पिछले कुछ महीनों में करीब 500 क्विंटल गुड़ जिसमें अनेक कीट और जीव जंतु मृत होकर मिल गए थे, उसको 5 से 10 रुपए प्रति किलो की दर से खरीदकर लाया था तथा उसे अपने निजी गोदाम में खुले आसमान के नीचे रिसाइकिल करके अमानक पॉलीथिन में पैक कर नया बताते हुए 40 से 50 रूपए प्रति किलो की दर से खपाया जा रहा था. जब खाद्य एवं सुरक्षा अधिकारी ने मौके पर पहुंचकर जांच की तब भी खराब गुड़ को रिसाइकिल करके नया बनाया जा रहा था. पंचनामा बनने और सैम्पल लिए जाने के बाद अब इस मामले को रफा-दफा करने के लिए छह अंकों की एक बड़ी रकम में सौदा तय होने की बात सामने आ रही है तथा जिम्मेदारों द्वारा इस मामले को लेकर पत्रकारों को दिए जा रहे बयानों से मामले में सौदेबाजी होने की आशंकाओं को और मजबूती मिल रही है.
खाद्य अधिकारी की कार्यवाही संदेहास्पद
नगर में खराब गुड़ को रिसाइकिल कर बना रहे एक व्यापारी के निजी गोदाम में खाद्य एवं सुरक्षा विभाग के अधिकारी केएल कुंभकार की कार्रवाई संदेहास्पद नजर आ रही है. जो कई सवालों को जन्म दे रही है. क्षेत्र में खाद्य अधिकारी ने इसी व्यापारी के गोदाम में 30 अक्टूबर को करवाई में गुड़ नष्ट कराया था, तो उसे सील क्यों नहीं किया और अगर गुड़ अच्छा था, तो नष्ट कर सैम्पल क्यों लिए गए. यानी अधिकारी द्वारा 26 दिसम्बर को हुई फुड पॉइजनिंग की घटना के लिए अवसर दिया गया. 28 दिसम्बर की कारवाई में संदिग्ध परिस्थिति मिलने पर नापतौल विभाग, जीएसटी विभाग, नगर परिषद सहित अन्य विभागों को सूचित क्यों नहीं किया गया. अधिकारी ने अकेले ही स्थिति को संभालने की कोशिश की.
नेताओं-अधिकारियों के सपोर्ट में जारी है खाद्य अधिकारी की मनमानी…
खाद्य अधिकारी क्षेत्र में स्थानीय अधिकारियों को सूचित किए बिना अकेले ही कार्रवाई के लिए पहुंचते हैं. बताया जा रहा है कि अभी तक सुसनेर में जहां भी कार्रवाई की गई अधिकांश के परिणाम सामने नहीं आते हैं. शायद कार्रवाई की प्रक्रिया पूर्ण होने से पहले समाप्त हो जाती है. सूत्रों की मानें तो खाद्य अधिकारी ने क्षेत्र में दुकानदारों से उनके व्यवसाय के अनुरूप प्रतिमाह सहयोग राशि ली जाती है. समान्यत: तीन साल में स्थानांतरण की प्रक्रिया के बजाय 10-10 सालों तक अधिकारी जिले में जमे हुए हैं. क्या खाद्य अधिकारी को बड़े नेताओं या जिला प्रशासन के बड़े अधिकारियों का सपोर्ट मिला हुआ है.
