चीतों पर खत्म नहीं हुआ दवाओं का नशा लेकिन एक्टिव हैं…

श्योपुर/ग्वालियर: चीतो काे कूनो नेशनल पार्क लाने से पहले जो दवाएं दी गईं थीं, उसका असर अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। चीता इन्हीं दवाओं के नशे में घूम फिर व भोजन कर रहे हैं। नामीबिया से साथ आए विशेषज्ञ कहते हैं कि चीते रिकवर कर रहे हैं व सेहत की दृष्टि से ठीक हैं। इन चीतों को अब तक करीब 85 किलो भैंस का मांस परोसा जा चुका है। पिछले तीन रोज में इन चीतों ने अपनी डाइट के हिसाब से भोजन नहीं किया। हालांकि उनमें स्वभावगत फुर्ती देखी जा रही है। विशेषज्ञों ने इन्हें पूरी तरह स्वस्थ माना है। चीते अपने बाड़े में वैसे ही एक्टिव नजर आ रहे हैं, जैसे कि नामीबिया के जंगलों व नेशनल पार्कों में रहते थे।

कूनो नेशनल पार्क के सूत्रों के मुताबिक इनके बाड़ों के इर्द गिर्द बनाई मचानों से ही वन्य जीव विशेषज्ञ चीतों की निगरानी कर रहे हैं। मचान को इस तरह कवर किया गया है कि चीतों को किसी इंसान की चौबीसों घण्टे उपस्थिति या निगरानी का शुबहा न हो। दो से तीन लोग जाकर इन चीतों की सक्रियता को बराबर परख रहे हैं। कूनो नेशनल पार्क के डीएफओ पीके वर्मा बताते हैं कि दो से चार घंटे के दरम्यान विशेषज्ञ और चिकित्सक गाड़ी से चीतों की निगरानी करने जाते हैं। एक चीते को तीन से चार किलो भैंस का मांस दिया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि कूनो नेशनल पार्क के ये नए मेहमान अपेक्षा के अनुसार ही व्यवहार कर रहे हैं।यह सवाल उठाया जा रहा है कि चीतों को लाए जाने के तीन दिन बीतने के बाद भी अब तक क्वारंटाइन करके एकांतवास में क्यों रखा गया है और इन्हें नेशनल पार्क के जंगल में क्यों नहीं छोड़ा जा रहा है तो इन सवालों व शंकाओं का जवाब भी वन विभाग की तरफ से आ गया है। विशेषज्ञ इन चीतों को क्वारंटाइन करने का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यही बताते हैं कि सुदूर महाद्वीप से आए चीते अगर किसी बीमारी से ग्रस्त हों तो उनकी पहचान हो सकेगी। यदि उन्हें यहां रहने के दौरान कोई असुविधा हो रही है तो उसकी भी पहचान डॉक्टर व विशेषज्ञ कर सकेंगे। वैसे भी प्रोटोकॉल है कि चीतों को एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप में स्थानांतरित करने से पहले और बाद में एक-एक महीने के लिए अलग रखा जाना चाहिए।
चीतों के नहीं रखे जाएंगे नए नाम…
पहले यह कहा जा रहा था कि कूनो में लाए गए इन चीतों का नया नामकरण होगा लेकिन उच्चपदस्थ अधिकारियों से चर्चा के बाद तय हुआ है कि नामीबिया से लाए गए इन आठ चीताें में से सात का नया नामकरण नहीं किया जाएगा। वे अपने नामीबियाई नाम से ही पहचाने जाएंगे। पीसीसीएफ वन्यजीव जेएस चाैहान ने इसकी पुष्टि की है। कूनो में नामीबिया से लाए गए सिर्फ एक चीते का ही नया नाम आशा रखा गया है। यह नाम भी प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी ने उसी दिन दिया, जब उन्हें रिलीज किया गया था। बाकी आठ चीतों के जाे बच्चे हाेंगे, कूनो में उनका ही नामकरण किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र माेदी ने चार साल की मादा चीता का नाम आशा रखा था। इसके अलावा ढाई साल के एक अन्य चीता का नाम तबिल्सी है, जिसका जन्म एरिंडी प्राइवेट गेम रिजर्व नामीबिया में हुआ था। इन सभी में सबसे वरिष्ठ चीता आठ साल की साशा है। साशा की करीबी दोस्त का नाम सवानाह है। एक और मादा चीता का नाम सियाया है जबकि नर चीतो के नाम फ्रेडी, एल्टन और ओबान हैं।
राजपरिवार की शिकायत पर कोर्ट ने कलेक्टर से मांगा जवाब
कूनो पालपुर राजपरिवार के सदस्य गोपाल देव के वकील द्वारा पेश की गई शिकायत पर विजयपुर न्यायालय ने श्योपुर कलेक्टर शिवम वर्मा को जवाब पेश करने के लिए निर्देशित किया है। गोपाल देव ने न्यायालय में अपील की है कि शासन ने उनकी 220 बीघा के करीब सिंचित जमीन के बदले उन्हें महज 27 बीघा असिंचित जमीन दी है, जो ऊबड़ खाबड़ है, इसलिए खेती नहीं हो पाती है। किले में उनके देवी देवताओं का मंदिर व स्थान है जिसमें पूजा अर्चना करने के लिए जाने से भी वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा उन्हें रोका टोका जाता है। उन्होंने अपील की है कि उन्हें सिंचित जमीन के बदले दूसरी सिंचित जमीन दी जाए, इसके साथ ही किले व कुआं, बावड़ी आदि का मुआवजा भी उन्हें दिया जाए। कोर्ट ने आगामी 29 सितंबर तक का समय कलेक्टर को जवाब पेश करने के लिए दिया है।

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