गाय गोहरी : आस्था, परंपरा और विश्वास का अनूठा संगम

झाबुआ. मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचलों झाबुआ, आलीराजपुर, धार, बड़वानी सहित उज्जैन में दीपावली के दूसरे दिन अर्थात नववर्ष, पड़वा के अवसर पर गाय गोहरी का पर्व मनाया जाता है। गाय गोहरी में गायों के पैरों के नीचे लेटने वाले लोगों को मन्नतधारी कहा जाता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन पूजा से जुड़ा हुआ माना जाता है।

दीपावली के अवसर पर आदिवासी और किसान अपने पशुधन को खूब सजाते-संवारते हैं। गाय और बैलों को रंग-बिरंगे रंगों से सजाया जाता है और उन पर रंगों के छापे लगाए जाते है। उनके सींगों को रंगा जाता है तथा गले में घुंघरू और घंटियां बांधी जाती हैं। सींगों के बीच मोर पंख भी लगाए जाते हैं। इसके बाद गायों की पूजा-अर्चना कर उन्हें पौष्टिक आहार खिलाया जाता है।

झाबुआ शहर में स्थानीय गोवर्धननाथ मंदिर परिसर में सुबह से ही गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाया जाता है और उसकी पूजा की जाती है। शाम करीब 4 बजे से गाय गोहरी का पर्व प्रारंभ होता है। ग्वाले और आसपास के ग्रामीण अपनी सजी-धजी गायों को लेकर मंदिर पहुंचते हैं। मंदिर के पुजारी झांझ-मंजीरे और ठपली बजाते हुए भजन करते आगे चलते हैं। उनके साथ बड़ी संख्या में नगर के पुरुष और महिलाएं भी भजन गाते हुए चलते हैं।

इसके पीछे गायों का झुंड चलता है और गायों के सामने मन्नतधारी जमीन पर औंधे मुंह लेट जाते हैं। इसके बाद गायों को उनके ऊपर से निकाला जाता है और इस तरह मंदिर की पांच से सात परिक्रमा लगाई जाती हैं।

गाय गोहरी देखने के लिए नगर के साथ ही आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इस दौरान काफी शोर-शराबा होता है, जिससे कई बार गायें भड़ककर भागने लगती हैं। ग्वाले उन्हें नियंत्रित करते हैं। जमीन पर लेटे मन्नतधारियों के ऊपर से गायों को निकाला जाता है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में आज तक किसी मन्नतधारी के गायों के पैरों से गंभीर रूप से घायल होने की बात सामने नहीं आई है।

मन्नतधारियों की मान्यता है कि गाय में भगवान का वास होता है और वह माता के समान है। गाय के खुर शरीर पर पड़ने से उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को बीमारी और रोग से मुक्ति मिलती है। इस दौरान मन्नतधारियों का साफा बांधकर सम्मान भी किया जाता है।

पूर्व समय में गाय गोहरी के दौरान लोग एक-दूसरे पर जमकर रामबाण चलाते थे और भारी आतिशबाजी भी की जाती थी। हालांकि, करीब दो दशक पहले गाय गोहरी के दौरान दो संप्रदायों के बीच विवाद होने और नगर में धारा 144 लागू होने के बाद प्रशासन ने आतिशबाजी की परंपरा पर रोक लगा दी।

इसके बावजूद आज भी गाय गोहरी को लेकर लोगों में आस्था, उत्साह और उमंग बनी हुई है। बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन को देखने के लिए पहुंचते है। मंदिर के परिक्रमा मार्ग पर गोहरी शुरू होने से पहले ही लोगों की भारी भीड़ जुट जाती है। घरों की छतों, सड़कों और आसपास के स्थानों पर नगर सहित ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोग गाय गोहरी देखने के लिए जमा होते हैं। कभी-कभार कुछ लोग पटाखे भी चला देते हैं। आयोजन को लेकर पुलिस प्रशासन की ओर से कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की जाती है।

झाबुआ शहर के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों पारा, कालिदेवी, खरडू, रजला सहित अन्य क्षेत्रों में भी आदिवासी समाज द्वारा गाय गोहरी का पर्व उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है।

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