
ओंकारेश्वर, आज से ठीक 100 वर्ष पूर्व यानी 1920 के दशक में, प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर और पवित्र ओमकार पर्वत (मान्धाता द्वीप) आज की तुलना में कहीं अधिक प्राकृतिक, शांत, दुर्गम और अलौकिक दिखाई देता था। उस दौर में यहाँ न तो आधुनिक कंक्रीट के निर्माण थे, न बड़े पुल और न ही पर्यटकों की भारी भीड़। एक सदी पहले के ओंकारेश्वर के उस दिव्य स्वरूप और वातावरण को इन मुख्य पहलुओं के जरिए जीवंत रूप में समझा जा सकता है:
स्पष्ट दिखाई देती थी ‘ॐ’ की दिव्य आकृति
वर्तमान में ओंकारेश्वर बांध और जल स्तर के नियंत्रण के कारण यहाँ के भौगोलिक स्वरूप में काफी बदलाव आ चुका है, लेकिन 100 साल पहले नर्मदा और कावेरी नदियों का प्रवाह पूरी तरह प्राकृतिक था। जब कोई दूर पहाड़ी से मान्धाता द्वीप को देखता था, तो घने जंगलों और पथरीली चट्टानों के बीच से बहती नर्मदा की दोनों धाराएं स्पष्ट रूप से ‘ॐ’ (OM) की दिव्य आकृति बनाती थीं। पर्वत पर आज की तरह घनी आबादी या पक्के मकान नहीं थे, बल्कि वह हरी-भरी वनस्पतियों और प्राचीन पत्थरों से ढका हुआ था।
मूल पाषाण रूप में गर्भगृह और प्राचीन घाट
उस समय श्री ओंकारेश्वर मंदिर का मुख्य ढांचा (जो 11वीं सदी के परमार राजाओं और 18वीं सदी में देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा जीर्णोद्धारित था) अपने मूल प्राचीन पाषाण (पत्थर) रूप में विद्यमान था। मंदिर के चारों ओर आज की तरह सुरक्षा घेरे, लोहे के बैरिकेड्स या आधुनिक लाइटें नहीं थीं। घाट और सीढ़ियां पूरी तरह से पत्थरों के बने थे जो समय के साथ घिसकर प्राचीन आभा देते थे। मुख्य गर्भगृह में जाने के लिए बहुत ही छोटा और संकरा प्राकृतिक मार्ग था, जहाँ लोग बिना किसी आधुनिक तामझाम के शांति से बैठकर महादेव के निराकार रूप के दर्शन करते थे।
झूला पुल के बिना लकड़ी की नावों से सफर
100 साल पहले नर्मदा नदी को पार करने के लिए आज की तरह कोई झूला पुल (सस्पेंशन ब्रिज) या पक्का कंक्रीट का पुल अस्तित्व में नहीं था। तीर्थयात्री केवल लकड़ी की पारंपरिक नावों के माध्यम से ही नदी पार करके मान्धाता द्वीप पर जाते थे। नदी का पानी कांच की तरह साफ और पवित्र था। घाटों पर केवल चुनिंदा नावें खड़ी होती थीं, जिससे नदी का किनारा बेहद शांत और नयनाभिराम लगता था।
बीहड़ और पथरीला परिक्रमा मार्ग
ओमकार पर्वत की 7 किलोमीटर की प्रसिद्ध परिक्रमा आज भले ही पक्की सड़कों, दुकानों और विश्राम गृहों से सुसज्जित हो, लेकिन 100 साल पहले यह एक बेहद बीहड़, पथरीला और जंगली पगडंडी मार्ग था। इस रास्ते पर केवल सच्चे साधु-संत और साहसी तीर्थयात्री ही चलते थे। रास्ते में पड़ने वाले सिद्धनाथ मंदिर और गौरी सोमनाथ मंदिर जैसे प्राचीन देवस्थान पूरी तरह से सुनसान और प्रकृति की गोद में स्थित थे, जहाँ केवल हवा की सरसराहट और पक्षियों की आवाजें गूंजती थीं।
एकांत में स्थित आदि शंकराचार्य की पावन गुफा
भगवान आदि शंकराचार्य की वह पावन गुफा, जहाँ उन्होंने अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद से दीक्षा ली थी, 100 साल पहले पूरी तरह से एकांत और प्राकृतिक अवस्था में थी। वहाँ आज की तरह कोई भव्य प्रतिमा या आधुनिक स्मारक (जैसे हाल ही में बना स्टैचू ऑफ वर्नेस) नहीं था। वह स्थान केवल तीव्र आध्यात्मिक ऊर्जा और गहरे सन्नाटे से भरा रहता था, जो ध्यान लगाने के लिए एकदम अनुकूल था।