“न्यूज़रूम बंद हो जाएंगे”: डीएनपीए ने सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल डेटा संरक्षण कानून को दी चुनौती

नयी दिल्ली, 27 अक्टूबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) की डिजिटल निजी डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका पर मंगलवार को नोटिस जारी किया। एसोसिएशन का दावा है कि ये प्रावधान प्रेस की आजादी पर प्रतिकूल असर डालते हैं।

डीएनपीए में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’, ‘द हिंदू’, ‘इंडिया टुडे’, ‘टाइम्स ग्रुप’, ‘ज़ी’, ‘एनडीटीवी’ और ‘नेटवर्क18’ सहित 21 प्रमुख समाचार संगठनों के डिजिटल विंग शामिल हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इन विवादित प्रावधानों पर रोक लगाने की मांग करने वाले आवेदन पर भी नोटिस जारी किया है, जिस पर अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने तर्क दिया कि यह कानून खोजी पत्रकारिता पर खासा असर डाल सकता है, क्योंकि इसके तहत पत्रकारों को किसी भी व्यक्ति पर रिपोर्टिंग करने से पहले उसकी सहमति लेना अनिवार्य होगा। सुश्री दीवान ने पीठ से कहा, “अगर हमें रिपोर्टिंग के लिए इजाजत मांगनी पड़ी तो न्यूज़रूम ही बंद हो जाएंगे। यह पूर्व-सेंसरशिप का दौर शुरू कर देगा।”

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों और प्रेस की आजादी के बीच संतुलन होना चाहिए। पीठ ने याचिकाकर्ताओं से कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए जरूरी सुरक्षात्मक उपायों के सुझाव देने को कहा।

संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में अधिनियम के कई प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है, साथ ही वर्ष 2025 के नियमों के नियम 16, 17 और 23 को चुनौती दी गई है। स्वतंत्र खोजी पत्रकार युक्ता मुद्गल भी इस मामले में सह-याचिकाकर्ता हैं।

याचिका में तर्क दिया गया है कि प्रस्तावित कानून के शुरुआती संस्करणों में छूट दिए जाने के बावजूद, अंतिम तौर पर इस अधिनियम में पत्रकारिता के लिए कोई विशेष छूट नहीं दी गयी है। याचिका में कहा गया है कि सहमति और डेटा हटाने की आवश्यकताएं सार्वजनिक पदों पर भ्रष्टाचार और कदाचार की जांच में बाधा डाल सकती हैं।

इसके अतिरिक्त, याचिका में डेटा संबंधी निजता और मध्यस्थों से जानकारी मांगने की सरकारी शक्तियों को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि पर्याप्त सुरक्षा उपायों के अभाव से पत्रकारिता में गोपनीय स्रोतों की पहचान उजागर हो सकती है, जिससे गुप्त सूचना देने वाले हतोत्साहित होंगे।

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